ऋषिकेश

गणेश विसर्जन से सर्जन की यात्रा, प्रकृति संरक्षण का लें संकल्प

परमार्थ निकेतन में अनंत चतुर्दशी पर पर्यावरण-अनुकूल गणेश उत्सव का संदेश

ऋषिकेश। अनंत चतुर्दशी के अवसर पर परमार्थ निकेतन में देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और भक्ति के साथ गणेश उत्सव मनाया। परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती और डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती ने अनंत चतुर्दशी की शुभकामनाएं देते हुए गणेश विसर्जन को केवल प्रतिमा के जल में विलीन होने की परंपरा न मानकर इसे नव सर्जन और नए संकल्प का अवसर बनाने का आह्वान किया।

पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि भगवान गणेश की प्रतिमा को श्रद्धा और भक्ति के साथ घरों व पूजा स्थलों में स्थापित किया जाता है। पूजा-अर्चना के बाद उसी श्रद्धा के साथ उनका विसर्जन किया जाता है। ऐसे में आवश्यक है कि विसर्जन के साथ यह भी विचार किया जाए कि इस प्रक्रिया से प्रकृति और समाज के लिए क्या नया सृजन हो रहा है।

उन्होंने कहा कि हमारी परंपराएं ऐसी हों, जो प्रकृति को बचाएं, संस्कृति को सहेजें और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखें। गणेश प्रतिमाओं के निर्माण में प्राकृतिक एवं पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का प्रयोग किया जा सकता है। प्रतिमाओं में औषधीय पौधों, फलदार वृक्षों या उपयोगी वनस्पतियों के बीज रखे जाएं, ताकि विसर्जन के बाद उन्हीं बीजों से नए पौधों का सृजन हो सके।

विसर्जन के साथ हो नवजीवन का सृजन

उन्होंने कहा कि जब एक प्रतिमा प्रकृति में विलीन होकर एक नए पौधे के जन्म का माध्यम बनेगी, तो गणेश विसर्जन केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं रहेगा, बल्कि विसर्जन से सर्जन, अंत से आरंभ और परिवर्तन से नवजीवन की यात्रा बन जाएगा।

पूज्य स्वामी जी ने लोगों से अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों का भी विसर्जन करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अहंकार का विसर्जन कर विनम्रता, नकारात्मकता का विसर्जन कर सकारात्मकता तथा प्रदूषण का विसर्जन कर प्रकृति संरक्षण का सर्जन किया जाना चाहिए।

पर्यावरण-अनुकूल गणेश उत्सव का आह्वान

परमार्थ निकेतन की ओर से परिवारों, विद्यालयों, संस्थाओं और समुदायों से पर्यावरण-अनुकूल गणेश उत्सव मनाने का आह्वान किया गया। प्राकृतिक सामग्री से निर्मित प्रतिमाओं को अपनाने, जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने और विसर्जन के बाद बीजों को धरती में रोपकर नए पौधों का सृजन करने का संदेश दिया गया।

इस अवसर पर संदेश दिया गया कि गणपति बप्पा केवल विदा नहीं होते, बल्कि अपने पीछे नई चेतना, नया संकल्प और नवजीवन का संदेश छोड़ जाते हैं। अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन को सर्जन से, श्रद्धा को सेवा से और परंपरा को प्रकृति संरक्षण से जोड़कर आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य का संकल्प लिया जाए।

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