ऋषिकेश

आयुर्वेद केवल चिकित्सा नहीं, प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की पद्धति : स्वामी चिदानन्द

परमार्थ निकेतन में विभिन्न देशों से आए योग-जिज्ञासुओं ने योग, वेदांत और आयुर्वेद का लिया प्रशिक्षण

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में विश्व के विभिन्न देशों से आए योग-जिज्ञासु भारतीय ऋषि परंपरा के ज्ञान से जुड़ रहे हैं। यहां योग, वेदांत और आयुर्वेद का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे साधकों ने परमार्थ निकेतन के पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती एवं डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती से भेंट कर योग, आयुर्वेद, भारतीय जीवन पद्धति और आध्यात्मिक साधना से जुड़ी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया।

आयुर्वेद दिवस के अवसर पर आयोजित विशेष संवाद में शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा और प्रकृति को समग्र स्वास्थ्य से जोड़ने वाली भारतीय जीवन दृष्टि पर चर्चा की गई। इस दौरान आयुर्वेद को दैनिक जीवन में अपनाने के विभिन्न पहलुओं पर भी विचार-विमर्श हुआ।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि आयुर्वेद केवल रोगों के उपचार का विज्ञान नहीं, बल्कि स्वस्थ, संतुलित, सात्त्विक और प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने की भारतीय पद्धति है। भारतीय ऋषि परंपरा ने हजारों वर्ष पूर्व यह समझ लिया था कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग है। जब जीवन प्रकृति की लय के अनुरूप चलता है तो स्वास्थ्य, शांति और संतुलन सहज रूप से प्राप्त होते हैं।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पूरा विश्व तनाव, असंतुलित जीवनशैली और प्रकृति से बढ़ती दूरी जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में योग, आयुर्वेद और वेदांत की समग्र जीवन दृष्टि महत्वपूर्ण है। योग व्यक्ति को भीतर से जोड़ता है, आयुर्वेद प्रकृति से जोड़ता है और वेदांत आत्मस्वरूप का बोध कराता है।

स्वामी चिदानन्द ने कहा कि आयुर्वेद में ‘आयुः’ का अर्थ जीवन और ‘वेद’ का अर्थ ज्ञान है। यह जीवन को जानने, समझने और सार्थक बनाने का विज्ञान है। आयुर्वेद केवल औषधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि आहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या, विचार, व्यवहार और जीवन के समग्र संतुलन का मार्गदर्शन करता है।

उन्होंने योग-जिज्ञासुओं से योग और आयुर्वेद को केवल पाठ्यक्रम या अभ्यास तक सीमित न रखने तथा इसे जीवन की संस्कृति और पद्धति बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि योग केवल आसन नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन, संयम और सजगता लाने की साधना है। इसी प्रकार आयुर्वेद केवल औषधि नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन के लिए संपूर्ण दृष्टिकोण है।

डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती ने विभिन्न देशों से आए साधकों के साथ संवाद करते हुए भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में योग और आयुर्वेद के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन दृष्टि में बाहरी स्वास्थ्य के साथ आंतरिक शांति और चेतना के विकास को भी महत्व दिया गया है।

विभिन्न देशों से आए योग-जिज्ञासुओं ने परमार्थ निकेतन में मिल रहे प्रशिक्षण और भारतीय संस्कृति के साथ अपने जुड़ाव को प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि गंगा तट पर योग, ध्यान, वेदांत और आयुर्वेद का अध्ययन उन्हें ज्ञान के साथ भारतीय जीवन पद्धति को अनुभव करने का अवसर प्रदान कर रहा है।

परमार्थ निकेतन में योग और आध्यात्मिक साधना के साथ गंगा आरती, सत्संग, ध्यान और भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयामों से भी देश-विदेश से आए साधक परिचित हो रहे हैं।

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