ऋषिकेश

अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस पर परमार्थ निकेतन से विश्व शांति का संदेश

स्वामी चिदानन्द सरस्वती बोले—शांति बाहर नहीं, भीतर जागृत होने वाली चेतना है

ऋषिकेश। अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन में विश्व के विभिन्न देशों से आए श्रद्धालुओं ने गंगा तट पर विश्व शांति, मानवता की एकता और प्रकृति संरक्षण के लिए प्रार्थना की। स्पेन, ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों से भारत की सनातन आध्यात्मिक संस्कृति, योग और ध्यान का अनुभव लेने पहुंचे श्रद्धालुओं ने परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती से भेंट कर आध्यात्मिक एवं जीवन से जुड़े विषयों पर मार्गदर्शन प्राप्त किया।

इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि मनुष्य सदियों से शांति की तलाश कर रहा है, लेकिन वास्तविक शांति बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अंतर्मन से प्रकट होती है। जब तक मनुष्य के भीतर द्वेष, अहंकार, भय, असंतोष और विभाजन की भावनाएं सक्रिय रहेंगी, तब तक बाहरी परिस्थितियां अनुकूल होने के बावजूद वास्तविक शांति का अनुभव कठिन रहेगा।

उन्होंने कहा कि शांति की शुरुआत संसार को बदलने से पहले स्वयं के भीतर उतरने से होती है। मनुष्य अक्सर अपनी शांति को परिस्थितियों से जोड़ देता है, जबकि शांति परिस्थितियों की दासी नहीं, बल्कि चेतना की अवस्था है।

स्वामी चिदानन्द ने कहा कि आज विश्व को केवल सीमाओं पर होने वाले युद्धों को समाप्त करने की ही नहीं, बल्कि मनुष्यों के हृदय में चल रहे संघर्षों को समाप्त करने की भी आवश्यकता है। बाहरी संघर्षों की जड़ अक्सर मनुष्य के भीतर के संघर्षों में होती है। ऐसे में विश्व शांति की यात्रा आत्मशांति से शुरू होती है। योग, ध्यान, प्रार्थना, सेवा, करुणा और आत्मचिंतन इसके महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

उन्होंने कहा कि भारत की सनातन परंपरा ने सदैव संपूर्ण विश्व के कल्याण की कामना की है। “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के सुख और मंगल की जीवन-दृष्टि है। इसी भावना में “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश निहित है।

परमार्थ निकेतन में विभिन्न देशों और संस्कृतियों से आए साधकों ने मां गंगा के तट पर एक साथ बैठकर विश्व शांति और मानवता के कल्याण के लिए प्रार्थना की। इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि भाषाएं और संस्कृतियां भले ही अलग-अलग हों, लेकिन शांति और प्रेम की आकांक्षा पूरी मानवता की साझा भावना है।

उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि शांति की खोज संसार से नहीं, स्वयं से शुरू करें। अपने भीतर के द्वेष को प्रेम, अशांति को ध्यान, अहंकार को विनम्रता और विभाजन को एकत्व की भावना में बदलकर ही समाज और विश्व में शांति का प्रकाश फैलाया जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *