ऋषिकेश

श्री रामकिंकर भारत भूषण सम्मान से सम्मानित हुए स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज को सामाजिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में उनके दीर्घकालीन योगदान के लिए प्रतिष्ठित ‘श्री रामकिंकर भारत भूषण सम्मान’ से सम्मानित किया गया। श्री रामकिंकर विचार मिशन के पूज्य स्वामी मैथिलीशरण जी महाराज ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया।

स्वामी मैथिलीशरण जी महाराज ने कहा कि स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का जीवन साधना से सेवा और सेवा से विश्वकल्याण की प्रेरणादायी यात्रा है। उन्होंने भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्यों, गंगा संरक्षण, पर्यावरण जागरूकता, स्वच्छता, सेवा और वैश्विक शांति के संदेश को देश-विदेश में व्यापक स्तर तक पहुंचाने का कार्य किया है।

सम्मान प्राप्त करते हुए स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने इसे श्री रामकिंकर जी महाराज की पावन स्मृति तथा संत परंपरा, सेवा-साधना और सनातन संस्कृति के प्रति सम्मान बताया। उन्होंने परमार्थ निकेतन से जुड़ी संत परंपरा और सत्संग की पुरानी स्मृतियों को भी साझा किया।

उन्होंने कहा कि परमार्थ निकेतन की पावन धरा संतों की चरणरज, सत्संग की अमृतधारा और साधना की अखंड परंपरा से सिंचित जीवंत तीर्थ है। यहां समय-समय पर भारत की महान संत परंपरा के अनेक ऋषितुल्य संतों, महापुरुषों और विद्वानों ने सत्संग, कथा एवं साधना के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना का प्रसार किया।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने स्वामी अखंडानन्द जी महाराज, स्वामी गंगेश्वरानन्द जी महाराज, डोगरे जी महाराज, मां आनंदमयी सहित अनेक संत-महापुरुषों के परमार्थ निकेतन आगमन का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि इन संतों की साधना, सत्संग और तपस्या ने इस क्षेत्र को आध्यात्मिक एवं तीर्थ नगरी के स्वरूप को मजबूत किया।

उन्होंने बताया कि पूज्य श्री रामकिंकर जी महाराज भी प्रतिवर्ष परमार्थ निकेतन आते थे और कथा एवं सत्संग के माध्यम से रामकथा की अमृतधारा प्रवाहित करते थे।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि आज आवश्यकता है कि तीर्थों की दिव्यता को समझते हुए उन्हें तीर्थ बनाए रखने का संकल्प लिया जाए। तीर्थ स्वच्छ, निर्मल, प्रदूषणमुक्त और नशामुक्त हों तथा यहां आने वाला प्रत्येक साधक बाहरी स्वच्छता के साथ अंतःकरण की स्वच्छता का भी अनुभव करे।

उन्होंने कहा कि संतों ने हमें पवित्र तीर्थों की विरासत सौंपी है और अब हमारी जिम्मेदारी है कि इनकी पवित्रता को सुरक्षित रखते हुए आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं। परमार्थ निकेतन की परंपरा आज भी सत्संग, सेवा, साधना और संस्कार की अखंड ज्योति को आगे बढ़ा रही है।

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