ऋषिकेश

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तैयारियों से सजा परमार्थ निकेतन

स्वामी चिदानन्द सरस्वती बोले—श्रीकृष्ण प्रेम, ज्ञान, कर्म और आनंद से जीवन को पूर्ण करने वाली चेतना

ऋषिकेश। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व को लेकर परमार्थ निकेतन में श्रद्धा और उत्साह का माहौल है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के लिए आश्रम परिसर को विशेष रूप से सजाया जा रहा है और विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों की तैयारियां जारी हैं। परमार्थ निकेतन ने देशवासियों और विश्वभर के श्रद्धालुओं को जन्माष्टमी की शुभकामनाएं देते हुए सभी के जीवन में प्रेम, धर्म, शांति, सद्भाव और करुणा की कामना की।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म के विनाश का प्रतीक है। जब समाज में अन्याय, अहंकार, हिंसा और असत्य बढ़ता है, तब धर्म की रक्षा के लिए परमात्मा का अवतरण होता है। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ, लेकिन उनका जीवन यह संदेश देता है कि सत्य और प्रकाश विपरीत परिस्थितियों के मोहताज नहीं होते।

उन्होंने कहा कि जन्माष्टमी मनुष्य को अपने भीतर के भय, मोह, अहंकार और अज्ञान के बंधनों से मुक्त होकर जीवन में कृष्ण के प्रकाश को प्रकट करने की प्रेरणा देती है। वर्तमान समय में जब दुनिया तनाव, संघर्ष और असंतुलन से जूझ रही है, तब भगवान श्रीकृष्ण का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि श्रीकृष्ण ने जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन के बीच रहकर धर्मपूर्वक कर्म करने की शिक्षा दी। निष्काम कर्म का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि जब कर्म सेवा बन जाता है तो सेवा साधना का रूप ले लेती है।

उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण प्रेम, ज्ञान और आनंद से जीवन को पूर्ण करने वाली चेतना हैं। वे वात्सल्य, प्रकृति और गौ-संस्कृति के संरक्षक, प्रेम और माधुर्य के प्रतीक तथा जीवन के मार्गदर्शक हैं। राधा के प्रेम में माधुर्य, सुदामा की मित्रता में आत्मीयता, द्रौपदी की पुकार में करुणा और अर्जुन के संशय में ज्ञान के रूप में श्रीकृष्ण जीवन के विविध आयामों को दर्शाते हैं।

स्वामी जी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जीवन भक्ति, ज्ञान, कर्म, योग, प्रेम, नीति, करुणा, नेतृत्व और लोककल्याण का समन्वय है। जन्माष्टमी का पर्व इसी दिव्य संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का अवसर है। उन्होंने सभी से प्रेम, सेवा, साधना और सद्भाव को जीवन का हिस्सा बनाकर समाज एवं विश्व कल्याण के लिए समर्पित होने का आह्वान किया।

परमार्थ निकेतन की ओर से प्रार्थना की गई कि भगवान श्रीकृष्ण सभी के हृदय में प्रेम, कर्मों में धर्म और जीवन में आनंद का प्रकाश प्रकट करें।

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