डॉ. डी.डी. पंत: विज्ञान से लेकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन तक एक विराट व्यक्तित्व
हिमालय की पीड़ा को समझने वाले वैज्ञानिक, शिक्षाविद् और पृथक राज्य के प्रबल पैरोकार
उत्तराखंड के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं, जिनका योगदान किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। प्रोफेसर देवी दत्त (डी.डी.) पंत भी ऐसी ही बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। वे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भौतिक विज्ञानी, प्रखर शिक्षाविद्, चिंतक और हिमालयी समाज की समस्याओं को गहराई से समझने वाले जनबुद्धिजीवी थे। विज्ञान की प्रयोगशाला से लेकर उत्तराखंड के गांवों और पहाड़ की राजनीति तक उनकी सक्रियता ने उन्हें विशिष्ट पहचान दी।

14 अगस्त 1919 को पिथौरागढ़ जिले के गणाईगंगोली-बनकोट क्षेत्र के समीप देवराड़ी पंत गांव में उनका जन्म हुआ। उनके पिता अंबा दत्त पंत वैद्य थे। साधारण ग्रामीण परिवेश और सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद डी.डी. पंत ने अपनी प्रतिभा और अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर उच्च शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान बनाया।
विज्ञान की दुनिया में अलग पहचान
डी.डी. पंत ने भौतिक विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त कर शोध के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। वे महान वैज्ञानिक सी.वी. रमन के साथ भी कार्य कर चुके थे और प्रकाशिकी एवं स्पेक्ट्रोस्कोपी से जुड़े शोध में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। नैनीताल के डीएसबी कॉलेज में उन्होंने शोध प्रयोगशाला विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीमित संसाधनों में वैज्ञानिक उपकरण तैयार करने की उनकी क्षमता उनके वैज्ञानिक कौशल और जुझारू व्यक्तित्व को दर्शाती है।
विज्ञान के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियां केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं थीं। वे एक लोकप्रिय शिक्षक और गंभीर चिंतक भी थे। कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति के रूप में उन्होंने उच्च शिक्षा की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हिमालय को लेकर दूरदृष्टि
डी.डी. पंत की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी—विज्ञान और समाज को साथ लेकर चलने की सोच। वे हिमालयी क्षेत्रों के विकास को मैदानी क्षेत्रों के विकास की नकल के रूप में नहीं देखते थे। उनका मानना था कि पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों, पर्यावरण, गांवों और स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकास की नीति बनाई जानी चाहिए।
उनकी चिंता केवल सड़क और भवन बनाने तक सीमित नहीं थी। वे चाहते थे कि पहाड़ के गांव आबाद रहें, स्थानीय लोगों को रोजगार मिले, पलायन रुके और प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक एवं संतुलित उपयोग हो। हिमालयी पर्यावरण और ग्रामीण समाज के प्रति उनकी यह संवेदनशीलता आज भी उतनी ही प्रासंगिक दिखाई देती है।
पृथक उत्तराखंड राज्य की राजनीतिक नींव
1970 के दशक में जब पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं को लेकर राजनीतिक चेतना तेज हो रही थी, तब डी.डी. पंत ने यह महसूस किया कि पहाड़ की समस्याओं के समाधान के लिए एक मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक मंच आवश्यक है।
24-25 जुलाई 1979 को मसूरी में उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) के गठन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और दल के संस्थापक अध्यक्ष बने। उनके साथ कई क्षेत्रीय नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पृथक उत्तराखंड की मांग को राजनीतिक स्वर देने का काम किया।
डी.डी. पंत के लिए पृथक राज्य केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं था। उनकी परिकल्पना में अलग राज्य का उद्देश्य था—पर्वतीय क्षेत्रों का संतुलित विकास, रोजगार के अवसर, पलायन पर रोक, शिक्षा का विस्तार और हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी की रक्षा। इसी व्यापक दृष्टि ने उन्हें उत्तराखंड राज्य आंदोलन के शुरुआती वैचारिक स्तंभों में स्थान दिया।
चुनावी राजनीति में भी उतरे
पृथक राज्य की मांग को जन-राजनीति से जोड़ने के उद्देश्य से डी.डी. पंत ने स्वयं चुनावी मैदान में भी कदम रखा। 1980 के लोकसभा चुनाव में वे उत्तराखंड क्रांति दल के उम्मीदवार के रूप में अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरे। उस समय अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र में वर्तमान पिथौरागढ़ क्षेत्र भी शामिल था।
यह चुनाव उनके लिए केवल राजनीतिक जीत-हार का विषय नहीं था, बल्कि पहाड़ के सवालों को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक पहुंचाने का एक प्रयास था। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में सत्ता की बजाय क्षेत्रीय हित और हिमालयी समाज के सवालों को प्राथमिकता दी।
आज भी प्रासंगिक है उनकी सोच
डी.डी. पंत का जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक वैज्ञानिक केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं होता। वह समाज, पर्यावरण और भविष्य की दिशा पर भी चिंतन कर सकता है। उन्होंने विज्ञान को ज्ञान का माध्यम बनाया, शिक्षा को समाज परिवर्तन का साधन माना और राजनीति को पहाड़ की आवाज उठाने का माध्यम बनाया।
आज उत्तराखंड पलायन, बेरोजगारी, पर्यावरणीय चुनौतियों, अनियोजित विकास और गांवों के खाली होने जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे समय में डी.डी. पंत की हिमालय-केंद्रित विकास दृष्टि को फिर से समझना आवश्यक हो जाता है।
स्मृति में जीवित एक विचार
9 मई 2001 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनके विचार आज भी उत्तराखंड की सामाजिक और राजनीतिक चेतना में जीवित हैं।
14 अगस्त को उनकी जयंती केवल एक महान वैज्ञानिक और शिक्षाविद् को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि उस दूरदर्शी व्यक्तित्व को नमन करने का दिन है जिसने दशकों पहले यह सवाल उठाया था कि हिमालय का विकास हिमालय की परिस्थितियों और यहां के लोगों की जरूरतों के अनुरूप कैसे हो।
डॉ. डी.डी. पंत का जीवन हमें यह संदेश देता है कि ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह समाज के काम आए; विकास तभी सार्थक है, जब उसमें गांव, प्रकृति और आम आदमी की जगह हो; और राजनीति तभी सार्थक है, जब वह जनहित की आवाज बने।
उत्तराखंड की धरती के इस महान वैज्ञानिक, शिक्षाविद् और राज्य निर्माण के वैचारिक पुरोधा को उनकी जयंती पर शत्-शत् नमन।
