ऋषिकेश

परमार्थ निकेतन पहुंचे स्वामी वेदविद्यानन्द सरस्वती, वेदों के संरक्षण और शास्त्रार्थ पर हुआ मंथन

ऋषिकेश। स्वामी वेदविद्यानन्द सरस्वती जी ने बुधवार को परमार्थ निकेतन पहुंचकर परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज से भेंट की। इस दौरान दोनों संतों के बीच वेदों के संरक्षण, संवर्धन और नवयुगीन पुनर्जागरण को लेकर व्यापक चर्चा हुई। विशेष रूप से वेद विद्यालयों की स्थापना, विशुद्ध वैदिक स्वर, उच्चारण एवं मंत्रोच्चार की प्रामाणिक परंपरा के संरक्षण तथा गुरुकुलों में विद्यार्थियों को शुद्ध वेद मंत्रों के नियमित अभ्यास और प्रशिक्षण पर जोर दिया गया।

 

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि वेद भारत की चेतना, संस्कृति और आध्यात्मिक विज्ञान के जीवंत स्रोत हैं। वेदों की मौखिक परंपरा, स्वर-विन्यास, ऋषि परंपरा और शास्त्रीय अनुशासन को सुरक्षित रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि वेदों का संरक्षण शुद्ध कंठ, अनुशासित साधना और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से ही संभव है।

दोनों संतों ने गुरुकुलों में शास्त्रार्थ की प्राचीन परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर भी विचार-विमर्श किया। उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षण संस्थानों में जिस प्रकार वाद-विवाद, शोध और बौद्धिक विमर्श के माध्यम से विद्यार्थियों की प्रतिभा विकसित की जाती है, उसी प्रकार गुरुकुलों में वेद, उपनिषद, दर्शन, व्याकरण, मीमांसा, न्याय और अन्य शास्त्रों पर शास्त्रार्थ, वैदिक संवाद, मंत्रोच्चारण तथा श्लोक-पाठ प्रतियोगिताएं आयोजित की जानी चाहिए।

स्वामी वेदविद्यानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत की प्राचीन शास्त्रार्थ परंपरा सत्य की खोज का माध्यम रही है। इसका उद्देश्य किसी की पराजय या विजय नहीं, बल्कि ज्ञान का विस्तार, चिंतन की परिष्कृति और सत्य की प्रतिष्ठा है। उन्होंने कहा कि इस परंपरा को आधुनिक संदर्भों में पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है, ताकि युवा पीढ़ी वेदों और शास्त्रों को केवल पढ़े ही नहीं, बल्कि उनके गूढ़ अर्थों को समझकर जीवन में भी उतारे।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत का भविष्य तकनीकी प्रगति के साथ अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े ज्ञान के पुनर्जागरण से और अधिक उज्ज्वल होगा। उन्होंने कहा कि वेदों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, मानव जीवन के उच्चतम मूल्य, समरसता, यज्ञभाव, पर्यावरण संरक्षण, आत्मानुशासन और विश्वकल्याण का संदेश निहित है। नई पीढ़ी का वेदों से जुड़ाव उसके व्यक्तित्व को ज्ञान के साथ संस्कार और मूल्यों से भी समृद्ध करेगा।

स्वामी वेदविद्यानन्द सरस्वती जी ने वैदिक परंपरा के संरक्षण को समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि अधिक से अधिक बालक-बालिकाओं को वैदिक अध्ययन के लिए प्रेरित करने, गुरुकुलों को सशक्त बनाने और योग्य आचार्यों का सम्मान करने की आवश्यकता है। उन्होंने वैदिक स्वर परंपरा की शुद्धता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर भी जोर दिया। उन्होंने प्रयागराज में संगम तट स्थित परमार्थ त्रिवेणी पुष्प और अरैल घाट पर ऋषिकन्याओं द्वारा वेदमंत्रों के साथ गंगा आरती की शुरुआत का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे प्रयास युवाओं को अपनी संस्कृति और परंपरा से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।

उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे आयोजन किए जाने की आवश्यकता बताई, जिनमें विभिन्न गुरुकुलों के विद्यार्थी एक मंच पर वैदिक मंत्रोच्चारण, शास्त्रार्थ, श्लोक-पाठ, वैदिक ज्ञान-विमर्श और संस्कृत वाङ्मय आधारित प्रतियोगिताओं में भाग ले सकें। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन प्रतिभाओं को मंच देने के साथ ही भारत की ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी के बीच पुनः प्रतिष्ठित करने में सहायक होंगे।

इस अवसर पर वैदिक परंपरा और गुरु-शिष्य संस्कृति के संरक्षण तथा भारत की ज्ञान-संस्कृति के पुनर्जागरण का संकल्प व्यक्त किया गया। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने श्रावण मास की दिव्य भेंट के रूप में स्वामी वेदविद्यानन्द सरस्वती जी को रुद्राक्ष का पौधा भेंट किया।

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