श्रीराम कथा के समापन पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती का संदेश: वृक्षारोपण ही प्रकृति और भविष्य की सच्ची आराधना
श्रावण मास के शुभ आगमन पर 75 हजार पौधारोपण महाअभियान का शुभारंभ, अध्यात्म, पर्यावरण और संस्कृति का अद्भुत संगम
गुरुग्राम। कालिस्ता रिजॉर्ट, कापसहेड़ा (नई दिल्ली) में आयोजित दिव्य श्रीराम कथा का समापन परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज के पावन सान्निध्य, आशीर्वाद एवं प्रेरणादायी उद्बोधन के साथ संपन्न हुआ। प्रख्यात कथा व्यास संत श्री मुरलीधर जी महाराज के श्रीमुख से प्रवाहित मानस ज्ञानधारा की पूर्णाहुति श्रावण मास के पावन आगमन से पूर्व हरित महोत्सव के साथ हुई।

अपने संबोधन में स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि श्रीराम कथा का समापन और श्रावण मास का आगमन एक दिव्य संयोग है। श्रावण प्रकृति, प्रार्थना और परमात्मा से पुनः जुड़ने का पावन अवसर है। उन्होंने कहा कि इस समय पौधारोपण केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि शिव आराधना, पृथ्वी वंदना और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा का आध्यात्मिक अनुष्ठान है।
उन्होंने कहा कि आज विश्व जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, प्रदूषण, जल संकट और जैव विविधता के विनाश जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन समस्याओं का समाधान केवल नीतियों से नहीं, बल्कि जनभागीदारी, जनचेतना और जनसंस्कार से संभव है। यदि प्रत्येक परिवार एक वृक्ष को परिवार के सदस्य की तरह अपनाकर उसका संरक्षण करे, तो पृथ्वी का प्राकृतिक संतुलन पुनः स्थापित किया जा सकता है।
स्वामी जी ने कहा कि वृक्ष केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, बल्कि आशा, सुरक्षा और भविष्य भी देते हैं। जहां वृक्षों का सम्मान होता है, वहां संस्कृति और सभ्यता भी सुरक्षित रहती है। उन्होंने भगवान श्रीराम के वनवास को प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का सर्वोत्तम उदाहरण बताते हुए कहा कि पंचवटी, चित्रकूट और दण्डकारण्य जैसे स्थल भारतीय संस्कृति में वन, ज्ञान और तपस्या के जीवंत केंद्र रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि हम श्रीराम के आदर्शों को जीवन में उतारना चाहते हैं, तो प्रकृति, नदियों, पर्वतों और वृक्षों के प्रति भी श्रद्धा विकसित करनी होगी।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में आवश्यकता केवल विकास की नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण और पर्यावरण-संतुलित विकास की है। यदि विकास प्रकृति को नष्ट कर दे तो वह विकास नहीं, विनाश है। इसलिए वृक्षारोपण को जनआंदोलन बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
कथा व्यास संत श्री मुरलीधर जी महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन सत्य, मर्यादा, करुणा, कर्तव्य और समर्पण का आदर्श है। कथा तभी सार्थक होती है जब उसके संस्कार व्यक्ति के विचार, व्यवहार और चरित्र में दिखाई दें। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति श्रीराम के एक भी गुण को अपने जीवन में धारण कर ले, तो परिवार, समाज और राष्ट्र में प्रेम, शांति, सद्भाव और नैतिकता का नया प्रकाश फैल सकता है।
इस अवसर पर श्री अशोक डिंगरा, श्री सुभाष डिंगरा एवं श्री मन्दीप डिंगरा ने स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के 75वें वर्ष में प्रवेश के उपलक्ष्य में 75 हजार पौधारोपण महाअभियान का संकल्प दोहराया। अभियान का शुभारंभ स्वामी जी ने स्वयं प्रथम पौधा रोपित कर किया। इसे पृथ्वी के भविष्य, आने वाली पीढ़ियों की स्वच्छ सांसों और मानवता के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया गया।
