टिहरी

डोबरा-चांठी पुल के ऊपर पहाड़ काटकर अवैध प्लाटिंग का आरोप, पर्यावरणीय खतरे को लेकर उठे सवाल

टिहरी। जिले के मदन नेगी तहसील अंतर्गत ग्राम रौलाकोट (मवाना तोक) में डोबरा-चांठी पुल के ऊपर पहाड़ काटकर की जा रही कथित अवैध प्लाटिंग को लेकर विवाद गहरा गया है। पूर्व विधायक प्रत्याशी एवं युवा नेता मोहित डिमरी ने इस मामले को उठाते हुए सरकार, प्रशासन और भू-माफियाओं पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने इसे पर्यावरण, स्थानीय संस्कृति और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बताया है।

मोहित डिमरी ने कहा कि डोबरा-चांठी पुल टिहरी की जनता की अस्मिता और लंबे संघर्ष का प्रतीक है, लेकिन इसके ठीक ऊपर पहाड़ों को काटकर बड़े पैमाने पर प्लाटिंग की जा रही है। उनका आरोप है कि ग्रामीणों से 80 से 100 नाली भूमि कम कीमतों पर खरीदी गई और अब वहां पेड़ों का कटान तथा अनियोजित निर्माण कार्य किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि क्षेत्र पहले से ही भूस्खलन प्रभावित और संवेदनशील जोन में आता है। ऐसे में पहाड़ों की कटान और बड़े पैमाने पर निर्माण भविष्य में गंभीर आपदा का कारण बन सकता है। डिमरी ने आशंका जताई कि यदि पहाड़ी का बड़ा हिस्सा दरकता है तो इसका असर डोबरा-चांठी पुल, टिहरी झील और आसपास के क्षेत्रों पर पड़ सकता है।

डिमरी के अनुसार, जिस भूमि को ग्रामीणों से कम कीमत पर खरीदा गया, उसी पर अब 120 गज के प्लॉट लाखों रुपये में बेचे जा रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि क्षेत्र में केवल प्लाटिंग ही नहीं, बल्कि लग्जरी डुप्लेक्स, विला और व्यावसायिक निर्माण की भी तैयारी चल रही है।

उन्होंने राज्य में हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर सशक्त भू-कानून लागू करने की मांग दोहराते हुए कहा कि कृषि भूमि, जंगलों और स्थानीय संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। उनका कहना है कि बाहरी निवेश और अंधाधुंध भूमि खरीद से स्थानीय लोगों के हित प्रभावित हो रहे हैं तथा प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान पर भी असर पड़ रहा है।

मोहित डिमरी ने टिहरी जिला प्रशासन और राज्य सरकार से मांग की है कि रौलाकोट क्षेत्र में हो रही कथित अवैध प्लाटिंग और पेड़ों के कटान की तत्काल जांच कराई जाए। साथ ही यह स्पष्ट किया जाए कि संवेदनशील क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण और व्यावसायिक प्लाटिंग की अनुमति किस आधार पर दी गई।

उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों से भी अपनी पुश्तैनी भूमि को जल्दबाजी या लालच में बेचने से बचने की अपील की। उनका कहना है कि जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की विरासत और पहाड़ की पहचान है, जिसकी सुरक्षा सामूहिक जिम्मेदारी है।

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