ऋषिकेश

यात्रा में ‘गप’ नहीं ‘जप’ करें : स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में आयोजित मासिक श्रीराम कथा में मंगलवार को आध्यात्मिक चेतना, भक्ति और संस्कारों की अद्भुत धारा प्रवाहित हुई। परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने अपने प्रेरणादायी संदेशों से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक जीवन, संयम और सेवा का संदेश दिया।
कथा व्यास संत श्री मुरलीधर जी महाराज ने श्रीराम कथा के माध्यम से भक्तों को प्रभु श्रीराम के आदर्शों, मर्यादाओं और जीवन मूल्यों से जुड़ने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम में संत रामप्रसाद दास जी महाराज तथा स्वामी उमाकान्तानन्द सरस्वती का भी पावन आगमन हुआ। सभी संतों ने पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती के सान्निध्य में आयोजित दिव्य गंगा आरती में सहभाग किया।


निर्जला एकादशी के अवसर पर अपने उद्बोधन में स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि यह पर्व केवल उपवास का नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और प्रभु से जुड़ने का अवसर है। उन्होंने कहा कि संतों की साधना और प्रभु कृपा से ही ऐसे दिव्य सत्संगों का लाभ प्राप्त होता है।
स्वामी जी ने कहा कि हमारे मंत्रों और संकीर्तन में अपार शक्ति है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक यह है कि हम प्रकृति के प्रत्येक कण में परमात्मा का दर्शन करें। जब मनुष्य प्रकृति में ईश्वर का अनुभव करने लगता है, तभी जीवन वास्तव में आध्यात्मिक बनता है।
चारधाम यात्रा और जीवन यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यात्रा के दौरान तीन बातों का विशेष ध्यान रखें — सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग न करें, जल को प्रदूषित न करें और यात्रा में ‘गप’ नहीं बल्कि ‘जप’ करें। उन्होंने इसे पर्यावरण संरक्षण और आंतरिक शुद्धि का संदेश बताया।
उन्होंने कम बोलने को भी साधना बताते हुए कहा कि आवश्यक और सार्थक वचन ही बोलने चाहिए। इससे वाणी में शक्ति, मन में स्थिरता और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कम बोलने से विवाद और तनाव भी कम होते हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि कथाओं का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन में सेवा, साधना और संस्कारों के बीज बोना है। यदि कथा सुनने के बाद व्यक्ति के व्यवहार में विनम्रता और सेवा भाव उत्पन्न हो, तभी कथा की वास्तविक फलश्रुति मानी जाएगी।
कार्यक्रम के दौरान भक्तजन श्रीराम नाम संकीर्तन और गंगा आरती में भावविभोर होकर आध्यात्मिक आनंद में डूबे नजर आए।

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