देहरादून

25 वर्ष बाद भी अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत उत्तराखण्ड : जगदीश ममगांई

देहरादून। पृथक उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के सहभागी और लंबे समय से सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहे राज्य आंदोलनकारी नेता जगदीश ममगांई की पुस्तक ‘स्वाधिकार के लिए छटपटाता उत्तराखण्ड’ का विमोचन उत्तरांचल प्रेस क्लब में आयोजित कार्यक्रम में किया गया। पुस्तक का विमोचन पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने किया।

इस अवसर पर सेवानिवृत्त आईएएस डाॅ. सुरेन्द्र सिंह पांगती, प्यारा उत्तराखण्ड के संपादक देव सिंह रावत, सेवानिवृत्त नौसेना अधिकारी पी.सी. थपलियाल, सुलोचना भट्ट, विजय सत्ती, लक्ष्मी थपलियाल, प्रकाश सुमन ध्यानी तथा मोहन सिंह ‘उत्तराखण्डी’ सहित अनेक राज्य आंदोलनकारी और जनसरोकार से जुड़े लोग मौजूद रहे।

मॉडल ऑफ गवर्नेंस तय नहीं कर पाए : हरीश रावत

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य तो बन गया, लेकिन राज्य गठन के समय शासन और प्रशासन की स्पष्ट दिशा तय नहीं हो पाई। उन्होंने कहा कि 27 प्रतिशत आरक्षण के मुद्दे से उपजा असंतोष और मुजफ्फरनगर कांड के बाद अलग राज्य की मांग निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई थी। कांग्रेस नेतृत्व और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सहयोग से राज्य निर्माण का सपना पूरा हुआ।

उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य पुनर्गठन अधिनियम में कई ऐसे प्रावधान रहे, जिनके कारण आज भी राज्य को अपनी परिसंपत्तियों और अधिकारों पर पूर्ण नियंत्रण नहीं मिल पाया है। साथ ही उन्होंने राज्य की भूमि, संस्कृति और जनजातीय समाज की सुरक्षा पर चिंता जताई।

25 वर्ष बाद भी परिसंपत्तियों पर पूर्ण अधिकार नहीं

पुस्तक के लेखक जगदीश ममगांई ने कहा कि उत्तराखण्ड अपनी रजत जयंती मना रहा है, लेकिन राज्य को अब तक अपनी परिसंपत्तियों, राजस्व अधिकारों और संसाधनों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम में ऐसे प्रावधान किए गए जिनके चलते आवास, सिंचाई, विद्युत, वन, परिवहन, पर्यटन और जल संसाधनों सहित अनेक परिसंपत्तियों का पूर्ण हस्तांतरण नहीं हो सका।

उन्होंने कहा कि जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ी भूमि, विस्थापन और आपदाओं का दंश उत्तराखण्ड झेलता है, जबकि राजस्व और लाभांश का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार को मिलता है।

युवाओं, रोजगार और पलायन पर चिंता

जगदीश ममगांई ने कहा कि राज्य निर्माण से पहले उत्तराखण्ड की “पानी और जवानी” सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती थी, लेकिन आज युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी नौकरियों में बाहरी लोगों की नियुक्तियां बढ़ रही हैं और भर्ती प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार की चर्चाएं आम हैं।

उन्होंने कहा कि पहाड़ों से लगातार पलायन हो रहा है, स्कूल बंद हो रहे हैं, स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क व परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है।

भू कानून और मूल निवास की मांग तेज

उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में मजबूत भू कानून लागू करने, कृषि भूमि की खरीद-फरोख्त पर प्रतिबंध लगाने तथा राज्य को संविधान की पांचवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग लंबे समय से उठ रही है। हिमाचल प्रदेश के भू कानून का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां स्थानीय लोगों के हितों की बेहतर सुरक्षा होती है।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जनसंख्या आधारित परिसीमन हुआ तो भविष्य में पहाड़ी जिलों की राजनीतिक हिस्सेदारी और कम हो सकती है।

संस्कृति, भाषा और पर्यावरण पर संकट

जगदीश ममगांई ने कहा कि उत्तराखण्ड की पारंपरिक भाषा, भोजन और संस्कृति लगातार उपेक्षित हो रही है। गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी भाषाओं को अब तक आधिकारिक मान्यता नहीं मिल पाई है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर होती जा रही है।

उन्होंने पर्यावरणीय संकट पर भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अनियोजित निर्माण, जंगलों की कटाई और परियोजनाओं के कारण भूस्खलन, बाढ़ और पारिस्थितिक असंतुलन बढ़ रहा है। उन्होंने उत्तराखण्ड के लिए “ग्रीन बोनस” की मांग को आवश्यक बताया।

शराबखोरी और सामाजिक समस्याओं पर चिंता

उन्होंने कहा कि पहाड़ों में शराब की बढ़ती प्रवृत्ति सामाजिक और आर्थिक संकट बन चुकी है। महिलाओं द्वारा वर्षों से चलाए जा रहे “नशा नहीं रोजगार दो” आंदोलन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि शराब परिवारों को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ रही है।

गैरसैंण, भू कानून और मूल निवास पर सरकार को घेरा

कार्यक्रम के संयोजक और राज्य आंदोलनकारी देव सिंह रावत ने आरोप लगाया कि उत्तराखण्ड को आत्मनिर्भर और खुशहाल राज्य बनने से रोकने के लिए गैरसैंण राजधानी, भू कानून, मूल निवास और राज्य आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर जनभावनाओं के अनुरूप निर्णय नहीं लिए गए।

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