क्रांतिकारी श्रीदेव सुमन : टिहरी राजशाही के विरुद्ध संघर्ष और बलिदान की अमर गाथा
उत्तराखंड की धरती वीरों, क्रांतिकारियों और जननायकों की भूमि रही है। इसी पावन भूमि ने एक ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी को जन्म दिया, जिन्होंने टिहरी राजशाही के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाते हुए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। वह महान क्रांतिकारी थे — श्रीदेव सुमन। उनका जीवन संघर्ष, त्याग और जनहित के लिए समर्पण की प्रेरणादायी मिसाल है।

श्रीदेव सुमन का जन्म 25 मई 1916 को टिहरी जनपद के जौल गांव में हुआ था। बचपन से ही उनमें अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस था। उन्होंने देश की स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से प्रेरित होकर टिहरी रियासत में जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू किया। उस समय टिहरी राजशाही में जनता पर अनेक प्रकार के अत्याचार होते थे और लोगों को बोलने तक की स्वतंत्रता नहीं थी।
श्रीदेव सुमन ने टिहरी प्रजा मंडल के माध्यम से जनता को संगठित किया और राजशाही के दमन के खिलाफ आंदोलन चलाया। उन्होंने जनअधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग उठाई। राजशाही ने उनके आंदोलनों को दबाने का प्रयास किया और उन्हें कई बार प्रताड़ित किया गया।
वर्ष 1944 में उन्हें गिरफ्तार कर टिहरी जेल में बंद कर दिया गया। जेल में भी उन्होंने अन्याय के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। उन्होंने अमानवीय व्यवहार और दमन के विरोध में आमरण अनशन शुरू किया। लगातार 84 दिनों तक चले इस ऐतिहासिक अनशन ने राजशाही की क्रूरता को उजागर कर दिया। अंततः 25 जुलाई 1944 को उन्होंने जेल में ही अपने प्राण त्याग दिए।
कहा जाता है कि उनके निधन के बाद राजशाही ने उनके पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार तक नहीं करने दिया और रात के अंधेरे में चुपचाप नदी में बहा दिया गया। लेकिन उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके संघर्ष ने टिहरी रियासत में लोकतंत्र की चेतना जगाई और आगे चलकर टिहरी राज्य के भारत में विलय का मार्ग प्रशस्त हुआ।
आज श्रीदेव सुमन केवल एक नाम नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष, लोकतंत्र और जनाधिकारों के प्रतीक हैं। उनकी जयंती पर पूरा उत्तराखंड उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सत्य, साहस और जनहित के लिए किया गया संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता।
क्रांतिकारी श्रीदेव सुमन का बलिदान सदैव उत्तराखंड और देशवासियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना रहेगा।
