पौड़ी

पुल्यासू में श्रीकृष्ण जन्म कथा सुन भाव-विभोर हुए श्रोता

द्वारीखाल/पौड़ी गढ़वाल। ग्राम पुल्यासू में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। कथा के दौरान श्रद्धालु भक्ति रस में डूबे नजर आए और पूरा वातावरण जयकारों एवं भजनों से भक्तिमय हो उठा।

कथावक्ता व्यास जी ने श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग से पूर्व रामचरित्र का वर्णन करते हुए भक्तों को धर्म, भक्ति और मानव जीवन के महत्व की प्रेरणा दी। उन्होंने बालक ध्रुव की अखंड भक्ति तथा ध्रुवलोक की प्राप्ति का प्रसंग सुनाया। कथा में बताया गया कि मनुष्य का जीवन जोंक के समान है, जो पहले आगे का हिस्सा टिकाती है और फिर पीछे का छोड़ती है। उसी प्रकार जीव शरीर त्यागने से पहले अगले शरीर की रचना कर लेता है।

व्यास जी ने भरत चरित्र का वर्णन करते हुए बताया कि भरत जी का मन मृग शावक में इतना लग गया कि उसके चिंतन में ही उन्होंने प्राण त्याग दिए जिसके कारण अगले जन्म में मृग योनि प्राप्त हुई। पूर्व जन्म की स्मृति रहने के कारण उन्होंने मृग शरीर जल्दी छोड़ दिया, बाद ब्राह्मण कुल में जन्म लिया और जड़भरत के रूप में जीवन व्यतीत किया। राजा रहूगण की पालकी उठाने के दौरान उन्होंने राजा को आत्मज्ञान का उपदेश दिया।

कथा में राजा परीक्षित और शुकदेव संवाद का भी विस्तार से वर्णन किया गया। परीक्षित द्वारा पूछे गए प्रश्न कि जाने-अनजाने हुए पापों का प्रायश्चित कैसे संभव है, इस पर शुकदेव जी ने कहा कि भगवान की भक्ति और नाम स्मरण ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है। गृहस्थ जीवन में होने वाले नित्य कर्मों से उत्पन्न पापों की शांति के लिए अग्नि को भोग लगाना, गोग्रास और तर्पण जैसे कार्य आवश्यक बताए गए।

अजामिल प्रसंग का वर्णन करते हुए व्यास जी ने बताया कि भगवान नारायण के नाम का प्रभाव इतना महान है कि अजामिल जैसे पापी का भी उद्धार हो गया। उन्होंने कहा कि भगवान का नाम किसी भी भाव से लिया जाए, उसका लाभ अवश्य मिलता है। जिस प्रकार आग में अनजाने में हाथ पड़ने पर भी वह जलाती है, उसी प्रकार भगवान का नाम भी कल्याणकारी होता है।

कथा के दौरान माता दिति के पुंसवन व्रत सहित विभिन्न अवतारों, गज-ग्राह कथा का भी वर्णन किया गया। व्यास जी ने बताया कि अदिति माता के पयोव्रत प्रभाव से विजया द्वादशी अथवा वामन द्वादशी के दिन भगवान वामन का अवतार हुआ। राजा बलि के यज्ञ में पहुंचकर भगवान वामन ने तीन पग भूमि मांगी और दो पग में संपूर्ण सृष्टि नाप ली। इसके बाद राजा बलि ने तीसरा चरण अपने सिर पर रखने का निवेदन किया, जिससे उनका उद्धार हुआ।

कथावक्ता व्यास जी ने रघुवंश का वर्णन, शबरी चरित्र सहित अनेक प्रेरणादायी प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को भक्ति और धर्म का संदेश दिया। इसके पश्चात वसुदेव एवं देवकी विवाह तथा भगवान श्रीकृष्ण जन्म की कथा सुनाई गई। श्रीकृष्ण के प्राकट्य प्रसंग के दौरान कथा स्थल पूरी तरह भक्तिमय वातावरण में डूब गया। आयोजन में भगवान श्रीकृष्ण जन्म की सुंदर झांकी सजाई गई, जिसमें एक छोटे बच्चे को बालकृष्ण के स्वरूप में प्रस्तुत किया गया। बालकृष्ण की मनमोहक छवि देखकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और पूरा पंडाल “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयकारों से गूंज उठा।

आज की कथा में चैलूसैंण, मष्टखाल, सीला, वरगड्डी, मेवाड़ और पुल्यासू सहित आसपास के क्षेत्रों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण कर धर्म लाभ अर्जित किया। वहीं यजमान परिवार के रिश्तेदार एवं परिचित भी अनेक गांवों और शहरों से कार्यक्रम में शामिल हुए। कथा स्थल पर दिनभर भक्तिमय वातावरण बना रहा और श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर नजर आए।

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