दिल्ली

उत्तराखण्ड बना, पर उत्तराखण्डी अब भी उपेक्षित – ममगांई

नई दिल्ली। उत्तराखण्ड राज्य अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने पर रजत जयंती वर्ष मना रहा है, लेकिन इस उत्सव के बीच पहाड़ों में अपेक्षित खुशी और संतोष का माहौल नजर नहीं आ रहा। राज्य आंदोलन से जुड़े नेता एवं लेखक जगदीश ममगाईं ने कहा कि “उत्तराखण्ड बनने के बाद भी उत्तराखण्डी उपेक्षित हैं और राज्य आंदोलन के सपने अधूरे हैं।”

दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलनकारी संगठनों की समन्वय समिति द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उनकी पुस्तक ‘स्वाधिकार के लिए छटपटाता उत्तराखण्ड’ का विमोचन किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, पत्रकारों और शिक्षाविदों की उपस्थिति रही तथा राज्य आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ममगांई ने कहा कि राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी उत्तराखण्ड को अपनी परिसंपत्तियों और राजस्व पर पूर्ण अधिकार नहीं मिल पाया है। हरिद्वार के कुम्भ और कांवड़ क्षेत्र के हस्तांतरण का मुद्दा अब भी लंबित है। उन्होंने कहा कि 25 वर्षों में 10 मुख्यमंत्री बदलना राज्य में नीतिगत अस्थिरता को दर्शाता है, जिससे विकास की गति प्रभावित हुई है।

उन्होंने कहा कि राज्य बनने के बाद जिस संतुलित विकास की उम्मीद थी, वह धरातल पर नजर नहीं आता। आर्थिक गतिविधियां मुख्य रूप से मैदानी जिलों में केंद्रित हैं, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार, कृषि और आधारभूत सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। छोटे-छोटे बिखरे खेत, चकबंदी का अभाव, जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान और कठोर वन कानूनों के कारण ग्रामीण जीवन संकट में है।

ममगांई ने कहा कि पहाड़ों में नशाखोरी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। महिलाएं “नशा नहीं, रोजगार दो” जैसे आंदोलनों के माध्यम से इसके खिलाफ संघर्ष कर रही हैं। उन्होंने तीर्थ स्थलों की स्थिति पर भी चिंता जताते हुए कहा कि बढ़ते पर्यटन दबाव के कारण केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे पवित्र स्थल प्रदूषण और अव्यवस्था का सामना कर रहे हैं।

उन्होंने अस्थायी राजधानी देहरादून और ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में किए जा रहे भारी खर्च पर सवाल उठाते हुए कहा कि वर्षभर में सीमित समय के लिए विधानसभा संचालन के बावजूद दो स्थानों पर व्यवस्था बनाए रखना राज्य पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ है। इसके साथ ही उन्होंने विधायकों के वेतन-भत्तों और पूर्व विधायकों को दी जा रही पेंशन व्यवस्था की भी समीक्षा की मांग की।

उन्होंने कहा कि राज्य बनने के बावजूद स्थानीय भाषाओं को अब तक आधिकारिक मान्यता नहीं मिल सकी है। सरकारी कामकाज और सूचना पटों में क्षेत्रीय भाषाओं का समुचित उपयोग नहीं हो रहा है, जो सांस्कृतिक पहचान के लिए चिंता का विषय है।

ममगांई ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तराखण्ड आंदोलन के दौरान शहीद हुए लोगों और महिला आंदोलनकारियों को अब तक न्याय नहीं मिल पाया है। दोषियों को सजा न मिलना राज्य के लिए पीड़ादायक स्थिति है।

कार्यक्रम में विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों, पत्रकारों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपने विचार रखे और राज्य निर्माण के उद्देश्यों को याद करते हुए वर्तमान परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त की।

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