पौड़ी

परमार्थ निकेतन में तीन दिवसीय मौन रिट्रीट का दिव्य समापन

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में आयोजित तीन दिवसीय मौन रिट्रीट का आज आध्यात्मिक वातावरण में दिव्य समापन हुआ। मां गंगा के पावन तट पर आयोजित इस रिट्रीट में देश-विदेश से आए साधकों ने मौन, ध्यान और सेवा के माध्यम से आत्मिक शांति और आंतरिक जागरण का अनुभव किया।

रिट्रीट के दौरान साधकों ने स्वामी चिदानन्द सरस्वती के पावन सान्निध्य में मौन साधना के जरिए अपने भीतर के शोर को शांत कर आत्मसंवाद की गहराइयों को आत्मसात किया। गंगा की कल-कल ध्वनि और प्राकृतिक वातावरण के बीच ज्ञान और चेतना की धारा निरंतर प्रवाहित होती रही।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं, बल्कि चेतना की प्रखर अवस्था है। “मौन ही वह सेतु है, जो जीव को शिव से और व्यक्ति को विराट से जोड़ता है।” उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे प्रतिदिन कुछ समय मौन में बिताकर आंतरिक शांति और आत्मबोध को विकसित करें।

उन्होंने कहा कि उपनिषदों का ज्ञान मौन की गहराइयों से ही प्रकट हुआ है, जहां शब्द समाप्त होते हैं, वहीं सत्य का उदय होता है। मौन में ही मन के विकार शांत होते हैं और जीवन को नई दिशा मिलती है।

इस रिट्रीट के माध्यम से प्रतिभागियों ने अनुभव किया कि मौन मुखर भी है और प्रखर भी, जो जीवन की जटिलताओं को सरल बनाने का दिव्य माध्यम है। परमार्थ निकेतन में ज्ञान, ध्यान और सेवा की त्रिवेणी सदैव प्रवाहित होती रही है, जो इस आयोजन के माध्यम से और अधिक सशक्त होकर सामने आई।

कार्यक्रम में योगाचार्य गंगा नन्दिनी, योगाचार्य गायत्री, उमा और रोहन ने योग, ध्यान, मौन एवं मंत्र उच्चारण सत्रों के माध्यम से साधकों का मार्गदर्शन किया।

मां गंगा के सान्निध्य में आयोजित यह रिट्रीट प्रकृति और अध्यात्म के अद्वितीय संगम का प्रतीक बनकर उभरा, जिसने प्रतिभागियों के जीवन में नई ऊर्जा और दिशा का संचार किया।

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