उत्तराखंड

पत्रकार स्वर्गीय उमेश डोभाल की 38वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि

“निर्भीक पत्रकारिता की मिसाल, सच की कीमत जान देकर चुकाई”

“कलम रुकती नहीं है मौत के खौफ से, सत्य जिंदा रहता है हमेशा इतिहास के झरोखे से।”

आज हम एक ऐसे व्यक्तित्व का स्मरण कर रहे हैं, जिसने पहाड़ों की शुद्ध हवा में घुले भ्रष्टाचार के जहर के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। 17 फरवरी 1952 को जन्मे उमेश डोभाल केवल एक नाम नहीं, बल्कि निर्भीक और जन-सरोकारी पत्रकारिता का एक अध्याय हैं।

संघर्ष और पत्रकारिता का सफर:

उमेश डोभाल जी ने मात्र 23 वर्ष की अल्पायु में ही समाज की कुरीतियों को अपनी कलम का निशाना बनाना शुरू कर दिया था। उनका सफर बिजनौर टाइम्स और पौड़ी टाइम्स से शुरू होकर नैनीताल समाचार, नवभारत टाइम्स और अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुँचा।

उनके लेखन के केंद्र में हमेशा पहाड़ की समस्याएँ रहीं। उन्होंने सत्ता और सिस्टम की परवाह किए बिना उस दौर के सबसे खतरनाक ‘शराब माफिया’ और व्याप्त ‘भ्रष्टाचार’ पर प्रहार किया। वे जानते थे कि रास्ता पथरीला है, लेकिन पहाड़ के प्रति उनकी निष्ठा अडिग थी।

शहादत: जब सच से डर गया माफिया

25 मार्च 1988 को शराब माफियाओं ने उनकी नृशंस हत्या कर दी। माफियाओं को लगा कि एक कलम को तोड़ देने से पहाड़ों में उठने वाली विरोध की आवाज शांत हो जाएगी, लेकिन वे गलत थे। उमेश डोभाल की शहादत ने पूरे उत्तराखंड में जन-चेतना की एक ऐसी लहर पैदा की, जिसने आगे चलकर कई आंदोलनों को जन्म दिया।

विरासत जो आज भी जीवंत है:

उमेश डोभाल आज शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी वैचारिक विरासत आज भी सुरक्षित है। उनकी स्मृति में दिया जाने वाला ‘उमेश डोभाल स्मृति सम्मान’ आज उन पत्रकारों के लिए सबसे बड़ा सम्मान है जो सत्ता की आँखों में आँखें डालकर सच बोलने का साहस रखते हैं।

उमेश जी का बलिदान हमें याद दिलाता है कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक अटूट जिम्मेदारी है। उनकी शहादत को कोटि-कोटि नमन।

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