नयार घाटी की पहचान पर संकट: खेती, मछलियां और परंपराएं हो रहीं विलुप्त
पौड़ी/सतपुली। नयार घाटी, जो कभी अपनी समृद्ध खेती और पारंपरिक खाद्य संस्कृति के लिए जानी जाती थी, आज बदलते समय के साथ अपनी पहचान खोती नजर आ रही है। दैसण, बिलखेत, बांघाट, सीला, बडखोलू और सतपुली क्षेत्र में एक समय सिंचित खेती का व्यापक विस्तार था, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत रहती थी।

सतपुली के होटलों में मौंदाड़स्यूं की प्रसिद्ध उड़द की दाल और ‘माछा-भात’ का स्वाद लोगों को विशेष रूप से आकर्षित करता था। नयार नदी में प्रचुर मात्रा में मिलने वाली मछलियां इस क्षेत्र की पहचान का अहम हिस्सा थीं।
हालांकि, वर्तमान में स्थिति काफी बदल चुकी है। पारंपरिक और संतुलित तरीकों के बजाय अवैज्ञानिक ढंग से मछली पकड़ने के कारण नयार नदी में मछलियों की संख्या में भारी गिरावट आई है। वहीं, लगातार हो रहे पलायन और अन्य सामाजिक-आर्थिक कारणों से खेती-बाड़ी भी प्रभावित हुई है, जिससे कई खेत बंजर हो चुके हैं।
इसी बीच सतपुली में झील निर्माण का कार्य प्रगति पर है, जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिलने और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों के समग्र विकास के लिए खेती, पशुपालन और बागवानी जैसे पारंपरिक तरीकों को पुनर्जीवित करना आवश्यक है। यदि इन क्षेत्रों में संतुलित विकास और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाए, तो नयार घाटी अपनी खोई हुई पहचान फिर से प्राप्त कर सकती है।
