उत्तराखंड

गंगा तट पर आध्यात्मिक रंगोत्सव: परमार्थ निकेतन में प्रेम, सद्भाव और मानवता के रंग बिखरे

ऋषिकेश, 4 मार्च। परमार्थ निकेतन, माँ गंगा के पावन तट पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं साध्वी भगवती सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में दिव्य, आध्यात्मिक और उत्सवमयी ऊर्जा के साथ ढोल-नगाड़ों की थाप पर रंगों का भव्य उत्सव हर्षोल्लासपूर्वक मनाया गया।
देश-विदेश से आए श्रद्धालु, योग जिज्ञासु और साधक इस पावन अवसर पर एकत्र हुए। सभी ने आपसी भेदभाव, जाति, भाषा और सीमाओं से ऊपर उठकर एक वैश्विक परिवार के रूप में प्रेम के रंगों में सराबोर होकर उत्सव मनाया।
इस अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने देशवासियों को रंगोत्सव की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता के रंगों की मधुर बौछार हो। उन्होंने कामना की कि जीवन का प्रत्येक क्षण आनंद, शांति और सकारात्मकता से परिपूर्ण रहे तथा घर-परिवार में प्रेम, स्वास्थ्य और सौहार्द सदा बना रहे।
स्वामी जी ने कहा कि होली का संदेश है कि हम एक-दूसरे के जीवन में रंग भरें, किसी के जीवन से रंग न छीनें। जीवन का सबसे सुंदर रंग ‘मानवता’ है, जो हर भेदभाव से ऊपर उठकर सभी को जोड़ता है। सेवा, सहयोग और सद्भाव को अपनाकर ही समाज में शांति और आनंद का वातावरण स्थापित किया जा सकता है।
साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि होली प्रेम और करुणा का उत्सव है। यह पर्व हमें परिवार, समाज और प्रकृति के साथ गहरा संबंध स्थापित करने की प्रेरणा देता है। उन्होंने प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल रंगों के उपयोग, जल संरक्षण तथा स्वच्छता के साथ होली मनाने का आह्वान किया। साथ ही मर्यादा और सद्भाव के साथ उत्सव मनाने पर बल दिया।


उन्होंने कहा कि होली का उत्साह केवल एक दिन तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन का स्थायी भाव बने। प्रतिदिन अपने व्यवहार में प्रेम, सहयोग, क्षमा और करुणा के रंग भरकर ही वास्तविक होली मनाई जा सकती है।
परमार्थ निकेतन में मनाया गया यह रंगोत्सव श्रद्धा, उल्लास और आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण रहा। रंगों का यह महापर्व मानवता, प्रेम, सद्भाव और आत्मिक जागरण का संदेश देने वाला बना। यह पावन अवसर सभी के जीवन में आनंद, नवचेतना और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता

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