ऋषिकेश

परमार्थ निकेतन में ‘संस्कारों की गंगा’ से जुड़ रहे प्रवासी भारतीय परिवार

स्वामी चिदानन्द सरस्वती बोले – संस्कार जीवन जीने की कला, संस्कृति हमारी पहचान

ऋषिकेश। माँ गंगा के निर्मल तट पर स्थित परमार्थ निकेतन वर्षों से सनातन संस्कृति और भारतीय संस्कारों की जीवंत धारा के रूप में विश्वभर में भारतीयता का प्रकाश फैला रहा है। यहाँ से प्रवाहित होने वाली ‘संस्कारों की गंगा’ असंख्य जीवनों को स्पर्श कर रही है, विशेषकर उन अप्रवासी भारतीय परिवारों को, जो अपनी जड़ों से जुड़े रहने की पावन आकांक्षा लेकर भारत आते हैं।

वैश्वीकरण के इस दौर में, जब भौतिक प्रगति तीव्र है परंतु सांस्कृतिक पहचान धूमिल होती जा रही है, ऐसे समय में परमार्थ निकेतन युवा पीढ़ी के लिए आशा का दीप बनकर खड़ा है। यहाँ आने वाले बच्चों और युवाओं को आध्यात्मिक पर्यटन के साथ अपनी परंपरा, वैदिक संस्कृति और अस्तित्व से साक्षात्कार का अवसर मिलता है।

गंगा तट पर प्रातःकालीन प्रार्थना, गंगा आरती, यज्ञ, दान, वैदिक मंत्रोच्चारण, ध्यान, योग एवं सत्संग के माध्यम से बच्चों के हृदय में सेवा, करुणा, अनुशासन और कृतज्ञता के संस्कार सहज ही अंकुरित होने लगते हैं। नन्हे हाथ जब यज्ञ में आहुति देते हैं और वेद मंत्रों का उच्चारण करते हैं, तब ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव उनके भीतर एक नई चेतना का संचार करता है।

लंदन से आए परिवारों को भारतीय संस्कृति की गहराई से परिचित कराते हुए स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि संस्कार केवल परंपराएँ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला हैं। शास्त्र केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन के मार्गदर्शक दीप हैं और संस्कृति केवल उत्सव नहीं, बल्कि हमारी पहचान और स्वाभिमान है।

उन्होंने कहा कि भारतीयता केवल भाषा या वेशभूषा तक सीमित नहीं, बल्कि विचार, व्यवहार और जीवन मूल्यों में निहित है। “सेवा ही साधना है” और “प्रकृति ही परिवार है” का संदेश देते हुए उन्होंने बच्चों को सेवा और दान के कार्यों—जैसे स्वच्छता अभियान, वृक्षारोपण और जरूरतमंदों की सहायता—से जोड़ने पर बल दिया। इससे उनमें समाज के प्रति उत्तरदायित्व और ‘सबके लिए जीने’ की भावना विकसित होती है।

स्वामी जी ने कहा कि संस्कार, शास्त्र और संस्कृति से जुड़ना अर्थात अपनी जड़ों से शक्ति प्राप्त करना है। यही जुड़ाव व्यक्ति को स्थिरता, परिवार को एकता और राष्ट्र को गौरव प्रदान करता है।

लंदन से आए धनुष लोहिया ने कहा कि पूज्य स्वामी जी के सान्निध्य में माँ गंगा के तट से प्रवाहित यह संस्कारों की धारा आने वाली पीढ़ियों को निरंतर आलोकित करती रहे—यही उनकी प्रार्थना और संकल्प है

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