ऋषिकेश

महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती पर परमार्थ निकेतन ने दी श्रद्धांजलि, ‘वेदों की ओर लौटो’ का संदेश दोहराया

ऋषिकेश। आर्य समाज के प्रवर्तक, महान समाज सुधारक और भारतीय नवजागरण के अग्रदूत महर्षि दयानंद सरस्वती जी की पावन जयंती के अवसर पर परमार्थ निकेतन की ओर से उनकी तपःपूत स्मृति को कोटि-कोटि नमन किया गया। इस अवसर पर उनके विचारों और आदर्शों को स्मरण करते हुए समाज के समग्र उत्थान का संकल्प दोहराया गया।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती जी का जीवन राष्ट्र, धर्म और समाज के लिए पूर्ण समर्पण का उदाहरण है। उनका उद्घोष “वेदों की ओर लौटो” आज भी भारतीय समाज को सत्य, ज्ञान और नैतिकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। उन्होंने उस समय समाज को जागृत किया, जब अंधविश्वास और कुरीतियों का प्रभाव व्यापक था। वेदों के प्रकाश के माध्यम से उन्होंने समाज को नई दिशा देने का कार्य किया।

महर्षि दयानंद ने बाल विवाह, सती प्रथा, छुआछूत और अंधश्रद्धा जैसी कुरीतियों के विरुद्ध निर्भीक आवाज उठाई। उनका मानना था कि धर्म वह है जो मानवता का कल्याण करे और समाज को जोड़ने का कार्य करे। इसी उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 1875 में आर्य समाज की स्थापना की, जो सामाजिक और आध्यात्मिक क्रांति का आधार बना।

शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को याद करते हुए वक्ताओं ने कहा कि उन्होंने स्त्री-शिक्षा, वैदिक ज्ञान और आधुनिक शिक्षा के समन्वय पर विशेष बल दिया। उनका विश्वास था कि शिक्षित और संस्कारित समाज ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। गुरुकुल व्यवस्था के माध्यम से चरित्रवान और राष्ट्रभक्त नागरिक तैयार करने का उनका स्वप्न आज भी प्रासंगिक है।

महर्षि दयानंद सरस्वती ने जाति-प्रथा और सामाजिक भेदभाव का विरोध करते हुए कर्म और गुण के आधार पर मनुष्य की पहचान की वकालत की। उनके विचारों ने समाज में आत्मगौरव और राष्ट्रीय चेतना का संचार किया। उनका ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बना हुआ है।

इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि महर्षि दयानंद एक सच्चे राष्ट्रनिर्माता थे। उनके विचारों ने स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक सेनानियों को प्रेरित किया और स्वदेशी व आत्मनिर्भरता की भावना को सशक्त किया।

कार्यक्रम में यह भी सुझाव दिया गया कि आधुनिक युग की आवश्यकता को देखते हुए ‘विकिपीडिया’ की तर्ज पर एक ‘वैदिकपीडिया’ का निर्माण किया जाए, जिससे भावी पीढ़ी को प्रामाणिक वैदिक ज्ञान, भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों की सुलभ जानकारी मिल सके।

अंत में सभी उपस्थितजनों ने महर्षि दयानंद सरस्वती जी के आदर्शों को जीवन में उतारने और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संकल्प लिया।

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