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पेशावर कांड के नायक चंद्रसिंह गढ़वाली: जिन्होंने निहत्थों पर गोली चलाने से इंकार कर इतिहास रच दिया

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने अपने साहस, नैतिक बल और देशप्रेम से अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी। ऐसे ही वीर सपूत थे चंद्रसिंह गढ़वाली, जिन्हें पेशावर कांड के नायक के रूप में जाना जाता है।

चंद्रसिंह गढ़वाली का जन्म 25 जनवरी 1891 को जनपद पौड़ी गढ़वाल की चौथान पट्टी के रौणसेरा गाँव में हुआ था। उनके पिता जलौथ सिंह भंडारी एक साधारण किसान थे। साधारण परिवार में जन्मे चंद्रसिंह गढ़वाली ने असाधारण साहस और देशभक्ति का परिचय देकर स्वयं को इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में अमर कर लिया।

उन्होंने 3 दिसंबर 1914 को लैंसडौन में ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती होकर सैनिक जीवन की शुरुआत की। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उन्हें 1 अगस्त 1915 को अन्य भारतीय सैनिकों के साथ फ्रांस भेजा गया, जहां उन्होंने युद्ध में भाग लिया। 1 फरवरी 1916 को वे पुनः लैंसडौन लौटे। इसके बाद 1917 में मेसोपोटामिया युद्ध तथा 1918 में बगदाद की लड़ाई में भी उन्होंने भाग लिया, जिनमें अंग्रेजी फौज को सफलता मिली।

हालांकि सैनिक सेवा के दौरान ही उनके मन में देशभक्ति की भावना और स्वतंत्रता का ज्वार उमड़ने लगा था। इसका सबसे बड़ा प्रमाण 23 अप्रैल 1930 को देखने को मिला, जब उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए पेशावर भेजा गया। वहां अंग्रेज अफसरों ने निहत्थे और शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया, लेकिन चंद्रसिंह गढ़वाली ने इस अमानवीय आदेश को मानने से साफ इंकार कर दिया। उनका यह निर्णय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अद्वितीय उदाहरण बन गया।

इस ऐतिहासिक विद्रोह के बाद अंग्रेज सरकार ने उन्हें कठोर दंड दिया। प्रसिद्ध बैरिस्टर मुकुंदीलाल ने सैनिकों का मुकदमा लड़ा, लेकिन चंद्रसिंह गढ़वाली को 14 वर्ष की सजा सुनाई गई। बाद में सजा घटाकर उन्हें 11 वर्ष जेल में रखा गया और अंततः 26 सितंबर 1941 को रिहा किया गया।

देश की आज़ादी के लिए उनका संघर्ष यहीं नहीं रुका। भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान उन्हें फिर से गिरफ्तार कर 3 वर्ष के लिए जेल में बंद कर दिया गया। वे 1945 में रिहा हुए।

स्वतंत्रता संग्राम के इस महान नायक ने जीवन के अंतिम वर्षों में गुमनामी और बीमारी से संघर्ष किया। अंततः 1 अक्टूबर 1979 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।

चंद्रसिंह गढ़वाली केवल एक सैनिक नहीं, बल्कि मानवता, साहस और देशप्रेम के प्रतीक थे। निहत्थे नागरिकों पर गोली चलाने से इंकार कर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा सैनिक वही होता है, जो अन्याय के सामने झुकने से इंकार कर दे। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अमिट स्रोत है।

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