परमार्थ निकेतन गंगा तट पर ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी असंगानन्द सरस्वती जी की स्मृति में राष्ट्रव्यापी श्रद्धांजलि समारोह व षोडशी भंडारा आयोजित
ऋषिकेश। भारत की प्राचीन, अक्षुण्ण एवं दिव्य सनातन संत परंपरा के उज्ज्वल नक्षत्र ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी असंगानन्द सरस्वती जी महाराज की पावन स्मृति में मंगलवार को परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश के गंगा तट पर राष्ट्रव्यापी श्रद्धांजलि समारोह एवं षोडशी भंडारे का भव्य आयोजन किया गया। देशभर से पधारे संत-महात्माओं, महामण्डलेश्वरवृंद, आचार्यों एवं सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक आलोक से ओतप्रोत कर दिया।

प्रातःकाल से ही परमार्थ निकेतन में केसरिया वस्त्रों में दीप्तिमान संतों का सान्निध्य उमड़ पड़ा। वेद मंत्रों की गूंज, मां गंगा की अविरल धारा और श्रद्धालुओं की नम्र नमन श्रद्धांजलि के बीच ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सनातन संस्कृति स्वयं सजीव होकर साक्षी बन गई हो।
कार्यक्रम की अध्यक्षता निर्वाण पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी विशोकानन्द भारती जी महाराज ने की। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज के नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में आयोजित इस श्रद्धांजलि समारोह में ब्रह्मलीन स्वामी असंगानन्द सरस्वती जी महाराज के तपस्वी, विरक्त एवं साधनामय जीवन को श्रद्धासुमन अर्पित किए गए।
पूज्य संतों एवं महामण्डलेश्वरवृंद ने एक स्वर में कहा कि स्वामी असंगानन्द सरस्वती जी का संपूर्ण जीवन विरक्ति, तपस्या एवं साधना का जीवंत शास्त्र था। उन्होंने न कभी स्वयं को प्रचारित किया और न ही बाह्य प्रदर्शन को महत्व दिया। उनका जीवन स्वयं एक उपदेश था, जहां शब्दों से अधिक साधना बोलती थी।
इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि संत देह से विदा हो सकते हैं, किंतु चेतना से कभी विदा नहीं होते। वे समय की सीमाओं से परे जाकर युगों की स्मृति बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि ब्रह्मलीन स्वामी जी का जीवन गीता के कर्मयोग, त्याग एवं वैराग्य का साकार स्वरूप था।
श्रद्धांजलि समारोह के उपरांत परमार्थ गंगा तट पर विशाल षोडशी भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें संतों, श्रद्धालुओं एवं आगंतुकों ने सहभाग किया। सेवा, समर्पण एवं समानता की भावना से सम्पन्न इस भंडारे में सैकड़ों संतों ने प्रेमपूर्वक प्रसाद ग्रहण किया।
कार्यक्रम के दौरान योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवीन्द्र पुरी जी महाराज, स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज, स्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज, साध्वी भगवती सरस्वती जी सहित अनेक संतों एवं महामण्डलेश्वरवृंद ने अपने श्रद्धांजलि उद्बोधनों में स्वामी असंगानन्द सरस्वती जी को संत परंपरा की आत्मा बताते हुए उनके जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया।
श्रद्धांजलि कार्यक्रम में देशभर के विभिन्न अखाड़ों, आश्रमों एवं आध्यात्मिक संस्थानों से पधारे संतों ने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर सभी पूज्य संतों, महामण्डलेश्वरवृंद एवं अतिथियों को रुद्राक्ष के पौधे भेंट किए गए।
कार्यक्रम ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि सनातन धर्म केवल अतीत नहीं, बल्कि सतत प्रवाहित वर्तमान है। ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी असंगानन्द सरस्वती जी महाराज भले ही स्थूल रूप में हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी तपश्चर्या, साधना और जीवन-दर्शन सनातन चेतना के रूप में युगों-युगों तक जीवित रहेगा।
