एक साल पहले की गूंज – गैरसैंण की गलियों में होलियारों का अनोखा अंदोलनी अंदाज़
सतपुली। एक साल बीत गया, लेकिन वह दृश्य अब भी आंखों के सामने ताज़ा है। 1 सितम्बर 2024 का दिन… जब सतपुली की होलियार टीम गैरसैंण की धरती पर उतरी थी। राजधानी गैरसैंण, मूल निवास और भू-कानून की मांग को लेकर उस दिन जो आवाज़ उठी, उसने पूरे उत्तराखंड का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था।

इस आंदोलन की अगुवाई होलियार टीम के अध्यक्ष प्रेम सिंह रावत कर रहे थे। उनके साथ गंगा सिंह बिष्ट, कप्तान रणधीर सिंह, त्रिलोक सिंह, सुरजन रौतेला, सुनील डंडरियाल, मनीष खुशहाल “स्वतंत्र”, डबल सिंह मियां, प्रीतम नेगी, संदीप डोबरियाल, चंद्रमोहन सिंह, संतोष गढ़वाली आदि उस हुंकार का हिस्सा बने थे।
होलियारों ने तब कहा था— गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाना हमारी अस्मिता का प्रश्न है। बिना मूल निवास और भू-कानून लागू किए, न तो पलायन थमेगा और न ही पहाड़ का भविष्य सुरक्षित होगा।
पर उस दिन की सबसे अनोखी बात यह थी कि यह आंदोलन किसी नारों या पोस्टरों से नहीं, बल्कि पारंपरिक होली गीतों से गूंज रहा था। गीतों के बोलों में चेतावनी भी थी, व्यंग्य भी और एक गहरी पीड़ा भी।
जनता भी उन गीतों को सुनकर थम गई थी, जैसे हर स्वर सीधे दिल को छू रहा हो।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो लगता है कि होलियारों ने सिर्फ विरोध ही नहीं किया, बल्कि आंदोलन की भाषा को लोकधुनों से सजाकर उसे और जीवंत बना दिया। यह एक ऐसा अंदाज़ था, जिसकी उस वक्त हर जगह चर्चा रही और जिसने यह साबित किया कि संस्कृति और संघर्ष जब साथ आते हैं तो संदेश और भी गहरा हो जाता है।
शायद यही कारण है कि एक साल बाद भी वह दिन यादों में जीवित है— जैसे कल ही होलियारों की टोली गैरसैंण की सड़कों पर गीत गा रही थी।
