पितरों को भूलना जड़ों को भूलने जैसा पितृपक्ष पर स्वामी चिदानंद सरस्वती का आह्वान
ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि पितृपक्ष केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि कृतज्ञता, संस्कार और आत्मबोध का पर्व है। श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान पूर्वजों के प्रति आभार और उनके ऋण को चुकाने का अवसर है। उन्होंने कहा कि यदि हम पितरों को भूल जाएँ तो यह वैसा ही होगा जैसे वृक्ष अपनी जड़ों को भूल जाए।

स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में परिवार केवल रक्त-संबंध नहीं, बल्कि संस्कारों और मूल्यों की धारा है। परिवार ही संस्कृति की आधारशिला और चरित्र निर्माण की पाठशाला है। पितृपक्ष हमें स्मरण कराता है कि मृत्यु अंत नहीं, आत्मा अमर है और पितरों का आशीर्वाद पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता रहता है।
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि आधुनिकता और तकनीकी युग में भी परिवार की परंपराओं और मूल्यों से जुड़े रहें। पितृपक्ष हमें यह संदेश देता है कि वर्तमान जीवन केवल आज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अतीत और भविष्य की शाश्वत कड़ी है।
ग्रहण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए स्वामी जी ने कहा कि भारतीय शास्त्रों ने ग्रहण को केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि चेतना और प्रकृति पर प्रभाव डालने वाला क्षण माना है। आयुर्वेद के अनुसार ग्रहण के समय शरीर की पाचन-शक्ति और ऊर्जा संतुलन प्रभावित होते हैं, जबकि आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि चंद्रमा का सीधा संबंध हमारे शरीर के जल-तत्व से है।
ग्रहण के दौरान उपवास और ध्यान से न केवल शरीर शुद्ध होता है, बल्कि मन भी स्थिर होता है। समुद्र में ज्वार-भाटा और वातावरण में ऊर्जा-तरंगों का उतार-चढ़ाव इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने ग्रहण काल को साधना, जप और प्रार्थना का सर्वोत्तम समय माना है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि ग्रहण हमें यह शिक्षा देता है कि अंधकार स्थायी नहीं होता। जैसे चंद्रमा छाया से निकलकर पुनः प्रकाशमान हो उठता है, वैसे ही जीवन की कठिनाइयाँ क्षणिक हैं और आत्मा की ज्योति शाश्वत है।
भाद्रपद पूर्णिमा पर पितृपक्ष और चंद्रग्रहण का यह मिलन शरीर की शुद्धि, मन की स्थिरता और आत्मा की जागृति का अद्वितीय अवसर है। स्वामी जी ने सभी से आह्वान किया कि इस विशेष समय में उपवास, मंत्र-जप और पितरों का स्मरण अवश्य करें ताकि जीवन नई ऊर्जा, संतुलन और आध्यात्मिकता से परिपूर्ण हो सके।
