जननायक विपिन चंद्र त्रिपाठी : उत्तराखंड आंदोलन के वैचारिक स्तंभ
उत्तराखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि और राज्य निर्माण की प्रक्रिया में जिन नेताओं ने वैचारिक और आंदोलनकारी भूमिका निभाई, उनमें स्व. विपिन चंद्र त्रिपाठी का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। वे एक ओर पर्यावरण और जनआंदोलनों के सशक्त चेहरा रहे तो दूसरी ओर उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के संस्थापक सदस्य और थिंक टैंक के रूप में राजनीति में सक्रिय रहे।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
विपिन त्रिपाठी का जन्म 23 फरवरी 1945 को अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट क्षेत्र के दैरी गांव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा मुक्तेश्वर और द्वाराहाट में पूरी करने के बाद उन्होंने हल्द्वानी से इलेक्ट्रिकल डिप्लोमा और कुमाऊं विश्वविद्यालय से स्नातक किया। छात्र जीवन से ही वे सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे।
सामाजिक चेतना और पत्रकारिता
सत्तर के दशक में त्रिपाठी ने भूमिहीन किसानों की लड़ाई को स्वर दिया और पत्रकारिता को जनता की आवाज़ बनाने का माध्यम चुना। उन्होंने युवजन मशाल और द्रोणाचल प्रहरी जैसे समाचार पत्र प्रकाशित किए, जिनके माध्यम से अन्याय, शोषण और पर्यावरण विनाश के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। आपातकाल के दौरान उनके प्रकाशनों को सील कर दिया गया और उन्हें करीब 22 महीने तक जेल में रहना पड़ा।
पर्यावरण और चिपको आंदोलन
त्रिपाठी जी ने 1974 में चिपको आंदोलन के तहत जंगलों को बचाने का कार्य किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का विरोध किया। वे मानते थे कि पहाड़ की आत्मा उसके जंगल, पानी और जमीन हैं, जिन्हें सुरक्षित रखना ही उत्तराखंड की असली प्रगति है।
उत्तराखंड क्रांति दल और राजनीति
26 जुलाई 1979 को जब यूकेडी का गठन हुआ, तो विपिन त्रिपाठी उसके संस्थापक नेताओं में शामिल थे। वे दल के नीतिगत और वैचारिक स्तंभ बने। 1992 में बागेश्वर मेले में उन्होंने गैरसैंण को उत्तराखंड की राजधानी घोषित करने और राज्य की प्रशासनिक संरचना का खाका प्रस्तुत किया।
2002 में वे द्वाराहाट विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए। लेकिन सत्ता के बजाय वे सदैव सिद्धांतों और जनहित की राजनीति पर अडिग रहे। यही कारण है कि उन्हें जनमानस में ‘विपिन दा’ के नाम से आदर और स्नेह मिला।
उत्तराखंड के लिए दृष्टि
त्रिपाठी जी का सपना था कि उत्तराखंड का विकास गाँवों और स्थानीय संसाधनों पर आधारित हो। वे चाहते थे कि पलायन रुके, युवाओं को रोजगार मिले और शिक्षा व स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएँ पहाड़ तक पहुँचें।
विरासत
30 अगस्त 2004 को विपिन चंद्र त्रिपाठी का निधन हो गया। लेकिन उनकी विचारधारा आज भी उत्तराखंड की राजनीति और समाज के लिए मार्गदर्शक बनी हुई है। द्वाराहाट में उनके नाम पर स्थापित बिपिन त्रिपाठी कुमाऊं प्रौद्योगिकी संस्थान (BTKIT) उनकी प्रगतिशील सोच और शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता का जीवंत प्रतीक है।
स्व. विपिन चंद्र त्रिपाठी उत्तराखंड आंदोलन के ऐसे जननायक थे, जिन्होंने सिद्धांत और ईमानदारी को राजनीति का मूल मंत्र माना। उन्होंने अपने संघर्षों और दृष्टि से उत्तराखंड को दिशा दी। राज्य के निर्माण और विकास की गाथा में उनका नाम हमेशा अमर रहेगा।
