जनकवि गिरीश तिवाड़ी ” गिर्दा” गीतों में संघर्ष शब्दों में क्रांति
जनकवि गिर्दा की पुण्यतिथि पर विशेष
उत्तराखंड की धरती ने अनेक लोकगायक, साहित्यकार और आंदोलनकारी दिए हैं, लेकिन जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ जैसा अद्वितीय व्यक्तित्व विरले ही होता है। गिर्दा केवल कवि या गीतकार नहीं थे, वे उत्तराखंड की चेतना की आवाज़ थे।

लोक और आंदोलन के गायक
गिर्दा ने अपने गीतों से न केवल जनभावनाओं को अभिव्यक्त किया बल्कि आंदोलनों को स्वर भी दिया। 1970 के दशक के चिपको आंदोलन से लेकर राज्य आंदोलन तक उनकी कविता और गीत प्रेरणा का स्रोत बने।
“जैंता एक दिन तो आऐगी, यूं दिन तो आलो नि…” जैसा उनका गीत आज भी संघर्षरत जनमानस की जुबान पर है।
पहाड़ की पीड़ा और जनता की आवाज़
गिर्दा की कविताओं और लोकगीतों में पहाड़ की वेदना, पलायन की पीड़ा और जनजीवन की जिजीविषा साफ झलकती है। वे मानते थे कि साहित्य केवल पुस्तकालयों या मंचों तक सीमित न होकर जनता के बीच जाना चाहिए। इसीलिए वे हमेशा गाँव-गाँव जाकर अपनी कविताओं और गीतों के जरिए लोगों को जगाते रहे।
रंगमंच और सृजनशीलता
कवि होने के साथ-साथ गिर्दा एक उत्कृष्ट रंगकर्मी भी थे। नाटकों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक अन्याय और विषमताओं पर चोट की। उनके गीतों में लोकधुन, पहाड़ की गंध और संघर्ष की गरिमा एक साथ मिलती है।
मानवता और सरलता के प्रतीक
गिर्दा का व्यक्तित्व बेहद सरल और मानवीय था। वे बड़े-बड़े मंचों से ज्यादा चाय की दुकान, चौपाल और आंदोलन स्थल पर सहज दिखते थे। लोगों से जुड़ने का यही स्वभाव उन्हें “जनकवि” बनाता है।
गिर्दा की विरासत
22 अगस्त 2010 को गिर्दा इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनका लिखा हर गीत, हर कविता आज भी जिंदा है। वे मानते थे कि साहित्य और कला का उद्देश्य समाज को सजग करना और बदलाव के लिए प्रेरित करना है। यही कारण है कि उनकी विरासत उत्तराखंड की चेतना में गहराई से रची-बसी है।
निष्कर्ष
गिर्दा ने अपनी रचनाओं से हमें यह सिखाया कि कविता केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि जनमानस का जीवन-संगीत है। उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें नमन करते हैं और संकल्प लेते हैं कि उनके सपनों के उत्तराखंड – जहां न्याय, समानता और स्वाभिमान हो – की दिशा में प्रयासरत रहेंगे।
