विश्लेषण

दिल्ली-एनसीआर के आवारा कुत्तों का आदेश:   विरोध में कई कथित पशु प्रेमी खड़े

नई दिल्ली, 13 अगस्त 2025 — भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते आवारा कुत्तों के मामलों को देखते हुए, उन्हें अगले आठ सप्ताह में शेल्टर होम्स में भेजने का आदेश दिया है, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि भावनात्मक दृष्टिकोण नहीं, बल्कि मानव जीवन को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
“Infants and young children should not at any cost fall prey to rabies”— यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानव सुरक्षा की गंभीर चेतावनी है ।

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साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशित किया कि कुत्तों को वापस सड़क पर नहीं छोड़ा जाए, और यदि कोई इस आदेश का विरोध करेगा तो उसके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी ।


“छद्म दयालुता” – एक सामाजिक मनोविज्ञान

“सड़क पर पड़े बच्चे, बुज़ुर्ग, गरीब और बीमार — इन्हें देखकर हम नज़रें फेर लेते हैं।
लेकिन कुत्ते दिखते ही ‘दया’ आ जाती है। अगर कहा जाए कि उन कुत्तों को अपने घर में शरण दो, तो दया हवा हो जाती है।
यह मानसिक विकार है — छद्म दयालुता का।”


प्रतिक्रियाएँ और विरोध

कथित पशु प्रेमियों और कार्यकर्ताओं से आवाज़ें

प्रोटेस्टर्स और कथित पशु प्रेमियों ने मंडराए गए आदेश का विरोध तेज़ कर दिया है:

  • India Gate, कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया, जिन्होंने इस कदम को “अमानवीय” बताया और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों—टीकाकरण, नसबंदी और सामुदायिक देखभाल—की वकालत की ।
  • Animal Welfare Centres (जैसे नोएडा का Dulari Animal Welfare Centre) ने इस आदेश को अनुपालनात्मक क्षमता की कमी बताया, साथ ही ABC नियमावली (2023) के विपरीत इसे निर्णय माना और कहा कि यह समाज, जानवरों और पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है ।

राजनीतिक और विशेषज्ञ प्रतिक्रियाएँ

  • राहुल गांधी ने आदेश को “दया विहीन, विज्ञान विरोधी” बताया। उनका कहना था: “ये विस्थापित प्राणी समस्याएं नहीं—ये जीवित प्राणी हैं। नसबंदी, टीकाकरण, और सामुदायिक देखभाल से Streets सुरक्षित रह सकते हैं, बिना Cruelty के।” ।
  • RWA  ने आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि यह आम लोगों में राहत पैदा कर सकता है क्योंकि कुत्ते काटने वाले मामलों में वृद्धि हो रही थी ।

निष्कर्ष

यह आदेश स्पष्ट रूप से मानव सुरक्षा को प्राथमिकता देता है, लेकिन इसने एक बड़ा सामाजिक और कानूनी विमर्श छेड़ दिया है:

  • क्या मनुष्यों के जीवन को संजोते समय जानवरों के कल्याण को पीछे रखा जा सकता है?
  • क्या “छद्म दयालुता” के बजाय हमें वास्तविक, वैज्ञानिक रूप से समर्थित समाधानों पर ध्यान देना चाहिए?
  • न्यायपालिका स्पष्ट पूर्वाग्रह के बिना क्या ऐसे आदेशों की समीक्षा कर सकती है, जो कानूनी और वैज्ञानिक संदर्भ दोनों से टकराते हैं?

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