उत्तराखंडक्राइम

हेमकुंड यात्रा मार्ग पर घटी रहस्यमयी घटना, 22 वर्षीय मनोज सिंह बिष्ट की मौत से फैला आक्रोश, परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है

📰 विशेष समाचार रिपोर्ट | दिनांक: 17 जुलाई 2025
स्थान: जोशीमठ, चमोली (उत्तराखंड)

घांघरिया, उत्तराखंड: उत्तराखंड की शांत घाटियों को झकझोर देने वाला एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसे लोग अब ‘घांघरिया हत्याकांड’ के नाम से जान रहे हैं। 22 वर्षीय युवक मनोज सिंह बिष्ट, जो घोड़े-खच्चरों के ज़रिए हेमकुंड साहिब यात्रियों को सफर में मदद करता था, 29 जून की रात को रहस्यमयी हालातों में लापता हो गया। लगभग दो सप्ताह बाद, उसका शव एक घने जंगल में पेड़ से लटका मिला।

यह घटना सिर्फ एक हत्या की आशंका नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के प्रशासन, पुलिस तंत्र और संवेदनहीन सिस्टम पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी है।

🔍 घटना का क्रमवार विवरण

29 जून 2025: वह आख़िरी शाम

मनोज सिंह, जो हर साल की तरह इस बार भी हेमकुंड यात्रा सीजन में घांघरिया पहुंचा था, यात्रियों को घोड़े से ले जाकर कमाई करता था। उसी शाम उसका झगड़ा हुआ एक अन्य घोड़ा मालिक देवेन्द्र चौहान से, जो क्षेत्र में प्रभावशाली माना जाता है। विवाद का कारण मजदूरी और भुगतान बताया गया।

स्थानीय लोगों के अनुसार, मनोज को विवाद के बाद पुलिस चौकी ले जाया गया, लेकिन “बातचीत में मामला सुलझ गया” कहकर उसे छोड़ दिया गया। मगर अगली सुबह, मनोज अपने डेरे पर नहीं था।

📴 गायब हुआ बेटा, सन्नाटा फैला फोन में

मनोज की मां नौमी देवी और पिता सुरेन्द्र सिंह बिष्ट (सेना से रिटायर्ड) उस दिन से हर पल फोन की घंटी सुनने की उम्मीद में बैठे रहे। शुरुआत में फोन की घंटी बजती रही, फिर बंद हो गया। अगली कई रातें परिवार ने अनिश्चितता में काटीं।

परिवार के सदस्यों दीपक और विनोद ने गांव के कुछ लड़कों के साथ घांघरिया पहुंचकर पूछताछ शुरू की, लेकिन हर जगह एक ही जवाब मिला — “29 जून के बाद मनोज को किसी ने नहीं देखा।”

🛑 प्रशासनिक उदासीनता: FIR में 10 दिन की देरी

पुलिस ने मनोज की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करने में 10 दिन लगा दिए।

परिजन और स्थानीय लोगों ने सोशल मीडिया और प्रदर्शन के ज़रिए दबाव डाला।

11 जुलाई को गढ़वाल रेंज के आईजी श्री राजीव स्वरूप को देहरादून में ज्ञापन सौंपा गया।

इसके बाद ही पुलिस ने हरकत दिखाई और FIR दर्ज की गई, जिसमें 6 नामज़द आरोपियों में मुख्य आरोपी देवेन्द्र चौहान का नाम है।


🪦 13 जुलाई 2025: मनोज का शव मिला, लेकिन जवाब नहीं

गांव के ही एक नेपाली मजदूर को जंगल में लकड़ी काटते समय पेड़ से लटका शव दिखाई दिया। पुलिस बुलाई गई, शव को नीचे उतारा गया। पहचान की पुष्टि के बाद सामने आया — वह मनोज सिंह बिष्ट था।

⚠️ शव की स्थिति ने खड़े किए कई सवाल:

शव के चेहरे पर मिट्टी और पत्तों के निशान थे।

पैरों में चप्पल नहीं थी, जबकि चप्पल शव के पास व्यवस्थित रूप से रखी थी।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक पुलिस ने शव को ‘आत्महत्या’ की संभावना से जोड़ने की कोशिश की।


🚨 जन आक्रोश और विरोध प्रदर्शन

घटना से पूरे चमोली जिले में गुस्सा फैल गया।
14 जुलाई को गोपेश्वर जिला अस्पताल के बाहर बड़ी संख्या में लोग जमा हुए और मनोज के परिवार को न्याय दिलाने की मांग की।

प्रमुख मांगें:

1. CBI जांच की सिफारिश की जाए।

2. देवेन्द्र चौहान और अन्य संदिग्धों से गहन पूछताछ की जाए।

3. CCTV फुटेज, कॉल डिटेल और मोबाइल लोकेशन सार्वजनिक किए जाएं।

4. परिवार को हर चरण की जांच रिपोर्ट पारदर्शी तरीके से उपलब्ध कराई जाए।


👮‍♂️ पुलिस का पक्ष और जांच की स्थिति

चमोली जिले के पुलिस अधीक्षक श्री सर्वेश पंवार ने बयान दिया:

> “पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह तय होगा कि यह आत्महत्या थी या हत्या। यदि हत्या पाई गई, तो दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा।”

लेकिन सवाल यह है कि अब तक क्या कदम उठाए गए?
क्या जांच अब भी धीमी नहीं है?
क्या सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका नहीं बनती?


💔 मनोज का सपना अधूरा रह गया

मनोज ने सीजन खत्म होने से पहले एक नई बाइक खरीदने का सपना देखा था।
अपने दोस्तों से कहा था —
“इस बार बाइक लेकर ही घर लौटूंगा।”

अब वह बाइक नहीं आएगी।
अब वह बेटा भी नहीं लौटेगा।

🧭 निष्कर्ष: घांघरिया की चुप्पी, एक माँ की चीख

घांघरिया का वो जंगल अब सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं,
एक गवाही है — एक युवक की मौत की,
एक माँ की ममता की चीख की,
और एक सोए हुए सिस्टम की बेरुखी की।

अब सवाल नहीं उठाना गुनाह होगा।


🕯️ श्रद्धांजलि मनोज को — और संकल्प न्याय का

मनोज अब जीवित नहीं है,
पर उसकी यादें, उसकी मां की आंखों में आंसू और उसके अधूरे सपने हमें झकझोरते हैं।

आज चुप रहना, अन्याय का साथ देना है।
अब ज़रूरी है —
हम सब मिलकर मनोज के लिए न्याय की आवाज़ बनें।


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