परमार्थ निकेतन से विश्वभर में पहुंच रही योग, वेद और वेदान्त की ज्ञानगंगा
स्वामी चिदानन्द सरस्वती और साध्वी भगवती सरस्वती के सान्निध्य में विदेशी साधक भारतीय ऋषि परम्परा, योग और आध्यात्मिक जीवनशैली को कर रहे आत्मसात
ऋषिकेश। तीर्थनगरी ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन भारतीय योग, वेद, वेदान्त और सनातन आध्यात्मिक परम्परा के वैश्विक केंद्र के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बना रहा है। विश्व के विभिन्न देशों से पहुंच रहे जिज्ञासु, साधक और विद्यार्थी यहां भारतीय ज्ञान परम्परा को केवल समझ नहीं रहे, बल्कि योग, ध्यान, साधना और सेवा के माध्यम से उसे अपने दैनिक जीवन में भी अपना रहे हैं।

परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती के पावन सान्निध्य और मार्गदर्शन में देश-विदेश से आने वाले साधक भारतीय दर्शन, संस्कृति और आध्यात्मिक जीवन मूल्यों से परिचित हो रहे हैं। यहां प्रातःकालीन योग एवं ध्यान, वेद मंत्रों का उच्चारण, आध्यात्मिक चर्चा, सत्संग, गंगा आरती और सेवा गतिविधियां साधकों को भारतीय ऋषि परम्परा से जोड़ रही हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती अपने विचारों के माध्यम से साधकों को करुणा, विनम्रता, पवित्र विचार और निःस्वार्थ सेवा का महत्व समझा रहे हैं। वेदों और उपनिषदों के ज्ञान के साथ वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वे भवन्तु सुखिनः और आत्मवत् सर्वभूतेषु जैसे शाश्वत विचारों को जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी जा रही है।
वहीं, साध्वी भगवती सरस्वती के मार्गदर्शन में विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय साधक भारतीय अध्यात्म, वेदान्त, ध्यान और आत्मचिंतन की गहराइयों को समझ रहे हैं। उनके सहज और व्यावहारिक मार्गदर्शन से विभिन्न देशों से आए जिज्ञासु आत्मा, चेतना, मन, अहंकार, मानसिक शांति और जीवन के वास्तविक उद्देश्य जैसे विषयों पर ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं।
परमार्थ निकेतन में विभिन्न देशों, भाषाओं और संस्कृतियों से आए लोग एक आध्यात्मिक परिवार के रूप में योग, ध्यान, सत्संग और सेवा में सहभागी बन रहे हैं। यहां गंगा तट पर होने वाली दिव्य आरती साधकों को प्रकृति, जीवन और परम चेतना के प्रति कृतज्ञता का भाव भी सिखाती है।
आध्यात्मिक गतिविधियों के साथ यहां पर्यावरण संरक्षण, नदियों की स्वच्छता, जैव विविधता, सादगी, करुणा और निःस्वार्थ सेवा जैसे विषयों पर भी विशेष जोर दिया जाता है। परमार्थ निकेतन भारतीय परम्परा की उस समग्र जीवनदृष्टि को विश्वभर में पहुंचाने का प्रयास कर रहा है, जिसमें आत्मकल्याण के साथ लोककल्याण और प्रकृति संरक्षण को भी समान महत्व दिया गया है।
विश्व वन हेल्थ दिवस पर दिया स्वस्थ पृथ्वी का संदेश
विश्व वन हेल्थ दिवस के अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने संदेश दिया कि मानव स्वास्थ्य, प्राणियों का स्वास्थ्य और प्रकृति का स्वास्थ्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जंगलों की सुरक्षा, जैव विविधता का संरक्षण और पर्यावरण का संतुलन ही स्वस्थ एवं सुरक्षित भविष्य का आधार है।
उन्होंने प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि एक स्वस्थ पृथ्वी ही सबके स्वस्थ भविष्य का आधार है।
परमार्थ निकेतन से योग, अध्यात्म, वेद और वेदान्त की यह ज्ञानधारा देश की सीमाओं से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर भारतीय ऋषि परम्परा, संस्कृति और सनातन जीवनदर्शन का संदेश प्रसारित कर रही है।

