हरिद्वार में 52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन का शुभारंभ, सनातन शास्त्रों की प्रामाणिकता और संरक्षण पर मंथन
स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के नेतृत्व में जुटे देशभर के संत, विद्वानों ने मूल पांडुलिपियों के संरक्षण और शास्त्रों के प्रामाणिक अध्ययन पर दिया जोर
हरिद्वार। पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार में 29 से 31 अक्टूबर तक आयोजित 52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन का शुभारंभ भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत, दर्शन और सनातन शास्त्रों के संरक्षण एवं संवर्धन के संकल्प के साथ हुआ। योगऋषि स्वामी रामदेव के आशीर्वाद और मार्गदर्शन तथा आचार्य बालकृष्ण के नेतृत्व में आयोजित सम्मेलन में देशभर के संतों, धर्माचार्यों, संस्कृत विद्वानों और विभिन्न क्षेत्रों की प्रमुख हस्तियों ने भाग लिया।

सम्मेलन में सनातन शास्त्रों की प्रामाणिकता, मूल ग्रंथों के संरक्षण, प्रक्षिप्त अंशों के शास्त्रीय परीक्षण और प्राचीन ग्रंथों की प्रमाणिक व्याख्या जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा हुई। वक्ताओं ने मूल पांडुलिपियों को एकत्र करने, उनका गंभीर अध्ययन करने और भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल स्वरूप को सामने लाने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम में जगद्गुरु शंकराचार्य, कार्ष्णि पीठाधीश्वर गुरु शरणानंद महाराज, परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती, मलूकपीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्र दास, गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद, विश्व जागृति मिशन के संत सुधांशु महाराज सहित अनेक संतों का सान्निध्य रहा। विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रामलाल सहित कई विशिष्ट हस्तियां भी उपस्थित रहीं।
शिक्षा व्यवस्था में सनातन मूल्यों को शामिल करने का आह्वान
जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा कि भारत की शिक्षा, शासन और व्यवहार सनातन धर्म के अनुरूप होना चाहिए। गुरु शरणानंद महाराज ने वेदों की मूल भावना और सत्य को समाज तक पहुंचाने पर जोर देते हुए कहा कि शास्त्रों की व्याख्या में अर्थ का अनर्थ नहीं होना चाहिए। उन्होंने भारतीय संस्कृति में आत्मा से उत्पन्न विचारों और ज्ञान की परंपरा को महत्वपूर्ण बताया।
स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि सनातन की यात्रा प्रतिरोध की नहीं, शोध की; बदले की नहीं, बदलाव की और विरोध की नहीं, सहयोग की यात्रा है। उन्होंने कहा कि आज समाज के सामने सोच का संकट है। शास्त्रों में प्रक्षिप्त अंशों और निराधार आक्षेपों से जुड़े विषयों पर गंभीर अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ ऋषियों की ज्ञान परंपरा को जोड़ने और सामूहिक प्रयासों से समाज को जागरूक करने का आह्वान किया।
मूल ग्रंथों के संरक्षण के लिए समिति गठन पर जोर
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद ने कहा कि वेदों और शास्त्रों में प्रक्षिप्त अंशों की पहचान होने से उनके मूल स्वरूप को समझने में सहायता मिलेगी। स्वामी गोविंददेव गिरि ने ऑनलाइन माध्यम से जुड़कर शास्त्रों में प्रक्षिप्त अंशों के परीक्षण और उनके निर्धारण के लिए समिति गठित करने की आवश्यकता बताई। स्वामी अवधेशानंद गिरि ने भी भारतीय संस्कृति, संस्कारों और शास्त्रीय परंपरा को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए संतों से एकजुट होकर कार्य करने का आह्वान किया।
स्वामी राजेंद्र दास ने संतों के बीच एकता और वैदिक सिद्धांतों के अनुरूप आचरण पर जोर दिया। वहीं, विश्व जागृति मिशन के संत सुधांशु महाराज ने वेद, स्मृति और सदाचरण की परंपरा को वर्तमान समय में प्रासंगिक बताते हुए शास्त्रों के अध्ययन और संशोधन की आवश्यकता पर बल दिया।
अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने मनुस्मृति सहित प्राचीन ग्रंथों की मूल प्रतियों को सुरक्षित रखने और उपलब्ध कराने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि शास्त्रार्थ और मीमांसा भारतीय परंपरा के महत्वपूर्ण अंग हैं।
शास्त्रों के अध्ययन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग पर भी चर्चा
सम्मेलन में प्राचीन ज्ञान परंपरा और आधुनिक तकनीक के समन्वय पर भी विचार रखे गए। स्वामी माधवप्रिय ने कहा कि युवाओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता का गुलाम बनने के बजाय उसका कुशल उपयोग करना सीखना चाहिए। इसके लिए संस्कृत के विद्वानों और पारंपरिक ज्ञान के जानकारों की आवश्यकता है।
पुंडरीक गोस्वामी ने सनातन शास्त्रों की प्रमाणिक व्याख्या के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विशेष मॉड्यूल तैयार करने का सुझाव दिया। स्वामी परमात्मानंद ने शास्त्रों के मूल सिद्धांतों को सुरक्षित रखते हुए डिजिटल पोर्टल विकसित करने की आवश्यकता बताई। वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि तकनीक का उपयोग प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन, संरक्षण और संदर्भों की सही समझ विकसित करने में किया जाना चाहिए।
भारतीय ज्ञान परंपरा को भविष्य की आधारशिला बनाने का संकल्प
स्वामी अविचलदास, स्वामी भागवत स्वरूप, स्वामी निर्मलानंद, स्वामी भद्रेश और अन्य संतों ने सनातन धर्म की मूल शिक्षाओं को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने तथा भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता बताई। विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार ने शास्त्रों में प्रक्षिप्त अंशों की पहचान और वेद-विरुद्ध माने जाने वाले अंशों के परीक्षण पर जोर दिया।
सम्मेलन में संस्कृत भाषा, वेद-वेदांग, भारतीय दर्शन, इतिहास, योग, आयुर्वेद और प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों पर भी विद्वत् विमर्श हो रहा है। युवा शोधार्थियों और महिला विदुषियों को अपने शोध प्रस्तुत करने का अवसर दिया जा रहा है। सम्मेलन के अंतर्गत संतों के मार्गदर्शन में घोषणापत्र तैयार करने तथा मूल पांडुलिपियों को एकत्र करने का आह्वान भी किया गया।
आयोजकों के अनुसार, इस आयोजन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल अतीत की धरोहर तक सीमित न रखते हुए वर्तमान और भविष्य के निर्माण में उसकी भूमिका को रेखांकित करना है।

