ऋषिकेश

परमार्थ निकेतन में पांच दिवसीय वेदान्त योग कोर्स का समापन, साधकों ने समझा आत्मबोध का महत्व

डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती से भेंट कर प्रतिभागियों ने आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के पाए समाधान, योग और वेदान्त के समन्वय पर दिया जोर

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में आयोजित पांच दिवसीय वेदान्त योग कोर्स का समापन आध्यात्मिक चेतना, आत्मचिंतन और आत्मबोध के संदेश के साथ हुआ। कोर्स के दौरान प्रतिभागियों ने योग, ध्यान और वेदान्त की शिक्षाओं के माध्यम से स्वयं को समझने तथा जीवन को अधिक सजग, संतुलित और शांतिमय बनाने के विभिन्न पहलुओं को जाना।

गंगा तट पर परमार्थ निकेतन की आध्यात्मिक परंपरा और भारतीय ऋषि संस्कृति के सान्निध्य में आयोजित इस कोर्स में योग को केवल शारीरिक अभ्यास तक सीमित न रखते हुए मन, चेतना और जीवन के वास्तविक स्वरूप को समझने की समग्र प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया।

इस अवसर पर परमार्थ निकेतन की डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि वेदान्त हमें जीवन से दूर जाना नहीं, बल्कि उसे उसकी वास्तविकता में समझना सिखाता है। स्वयं को जानने की यात्रा से व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और जीवन के विभिन्न प्रश्नों को समझने की दृष्टि विकसित करता है। वेदान्त का उद्देश्य केवल शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारना है, जिससे विचारों में स्पष्टता, व्यवहार में करुणा और जीवन में शांति का विकास हो सके।

उन्होंने वेदान्त की शिक्षाओं के माध्यम से अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने और जीवन को नई दृष्टि से देखने के महत्व पर प्रकाश डाला।

कोर्स के दौरान प्रतिभागियों को जीवन के मूलभूत प्रश्नों, आत्मचिंतन और आंतरिक शांति जैसे विषयों पर विचार करने का अवसर मिला। उपनिषदों के महावाक्य *‘तत्त्वमसि’* अर्थात ‘वह तुम हो’ के माध्यम से आत्मबोध की अवधारणा को समझाया गया। वेदान्त की यह दृष्टि व्यक्ति को जागरूकता, विवेक, करुणा और उत्तरदायित्व के साथ जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है।

पांच दिवसीय कोर्स के प्रतिभागियों ने डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी से भेंट कर विभिन्न आध्यात्मिक विषयों पर अपनी जिज्ञासाएं व्यक्त कीं और उनका मार्गदर्शन प्राप्त किया। इस संवाद ने साधकों को वेदान्त की शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन से जोड़ने तथा आध्यात्मिक विषयों पर गहराई से विचार करने की प्रेरणा दी।

कार्यक्रम में योग और वेदान्त के समन्वय को भारतीय ज्ञान परंपरा की विशिष्टता के रूप में रेखांकित किया गया। योग जहां अनुशासन, एकाग्रता और संतुलन विकसित करता है, वहीं ध्यान मन को समझने तथा वेदान्त स्वयं के वास्तविक स्वरूप को जानने की दृष्टि प्रदान करता है।

परमार्थ निकेतन में आयोजित यह कोर्स ज्ञान को जीवन, साधना को अनुभव और आध्यात्मिकता को मानवता की सेवा से जोड़ने की दिशा में एक प्रेरणादायी पहल के रूप में सामने आया।

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