नाना पाटेकर के निधन से भारतीय सिनेमा में शोक की लहर, परमार्थ निकेतन ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि
**स्वामी चिदानन्द सरस्वती बोले—अभिनय को जिया, समाजसेवा से जगाई उम्मीद; गंगा तट पर बिताए आत्मीय पल किए याद**
ऋषिकेश। भारतीय सिनेमा के अभिनेता नाना पाटेकर के निधन पर परमार्थ निकेतन की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने उनके निधन को कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताते हुए कहा कि नाना पाटेकर केवल एक विलक्षण अभिनेता ही नहीं, बल्कि संवेदनशील व्यक्तित्व और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखने वाले इंसान भी थे।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि नाना पाटेकर के साथ मां गंगा के पावन तट पर बिताए आत्मीय क्षण आज स्मृतियों में जीवंत हो उठे हैं। उनका सहज अपनापन, सरल व्यवहार और बिना किसी आडंबर के लोगों से जुड़ने की कला सदैव याद रहेगी। परमार्थ निकेतन आगमन, गंगा आरती में सहभागिता और गंगा तट पर हुई आत्मीय बातचीत परमार्थ परिवार के लिए अमूल्य स्मृतियां हैं।
उन्होंने कहा कि नाना पाटेकर ने पांच दशकों से अधिक की अपनी अभिनय यात्रा में अनेक यादगार किरदार निभाए। उनकी आवाज में प्रभाव, संवादों में गहराई और आंखों में भावों की ऐसी अभिव्यक्ति थी, जो बिना शब्दों के भी दर्शकों के हृदय को छू लेती थी। उनकी अभिनय शैली की विशेषता थी कि पर्दे पर कलाकार से अधिक उनका निभाया हुआ चरित्र जीवंत नजर आता था। उन्होंने अभिनय को केवल पेशा नहीं बनाया, बल्कि उसे अपनी संवेदनाओं और अनुभवों से जिया।
अभिनय के साथ सामाजिक सरोकारों से भी बनाई विशिष्ट पहचान
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि नाना पाटेकर की कला मनोरंजन तक सीमित नहीं रही। उनके किरदारों में समाज की सच्चाइयां, मानवीय संघर्ष, रिश्तों की जटिलताएं और जीवन की वास्तविकताएं दिखाई देती थीं। उनका अभिनय दर्शकों को भावुक करने के साथ ही सोचने और समाज को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करता था।
उन्होंने कहा कि नाना पाटेकर की पहचान उनके अभिनय से कहीं आगे थी। उन्होंने प्रसिद्धि को मानवीय सरोकारों से ऊपर नहीं रखा। नाम फाउंडेशन के माध्यम से सूखे से प्रभावित किसान परिवारों की सहायता करना और संकट से जूझ रहे लोगों के जीवन में आशा जगाने का प्रयास उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता का उदाहरण है। देश की सीमाओं पर पहुंचकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के उनके प्रयास भी उनके संवेदनशील और जिम्मेदार व्यक्तित्व को दर्शाते हैं।
गंगा तट की स्मृतियां रहेंगी सदैव जीवंत
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि नाना पाटेकर का अपनी मिट्टी, अपने लोगों और समाज की वास्तविकताओं से जुड़ाव उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में शामिल था। प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक दायित्वों को महत्व दिया।
उन्होंने कहा कि नाना पाटेकर का जाना भारतीय सिनेमा और कला जगत में ऐसी रिक्तता छोड़ गया है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा। हालांकि, उनके यादगार किरदार, प्रभावशाली अभिनय, सामाजिक कार्य और आत्मीय व्यवहार की स्मृतियां उन्हें सदैव लोगों के बीच जीवंत रखेंगी।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने मां गंगा से प्रार्थना की कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा उनके परिवारजनों, प्रियजनों और असंख्य प्रशंसकों को इस कठिन समय में दुःख सहने की शक्ति, धैर्य और संबल प्रदान करें।

