संस्कृति

श्राद्ध पक्ष की बदलती परंपराएं: कभी गांवों में गूंजती थी पितरों की श्रद्धा, अब सिमट रही विरासत

खेती से तैयार होता था श्राद्ध का सामान, ओखली-जंदरी में कुटते थे अनाज; पलायन और बदलती जीवनशैली ने बदला पहाड़ का पारंपरिक श्राद्ध

पौड़ी। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में श्राद्ध पक्ष कभी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गांव की संस्कृति, कृषि परंपरा और पारिवारिक एकजुटता का पर्व हुआ करता था। पितरों के निमित्त 16 दिनों तक चलने वाली परंपराओं में घर की खेती से लेकर स्थानीय संसाधनों तक का विशेष महत्व रहता था। समय के साथ इन परंपराओं में बदलाव आया है और आज पहाड़ के कई गांवों में श्राद्ध की पुरानी विधियां और उनसे जुड़ी सामग्री धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है।

कुछ वर्ष पहले तक श्राद्ध पक्ष शुरू होने से पहले ही घरों में तैयारियां शुरू हो जाती थीं। पितरों के निमित्त ककड़ी, कद्दू, तोरी, लौकी जैसी मौसमी सब्जियां और फल, घर की खेती के चावल, चिउड़ा, झंगर्याल, कौंडियाल, मुंगरी का आटा, सत्तू, दाल समेत अनेक पारंपरिक खाद्य सामग्री जुटाई जाती थी। कई सामग्री आज की तरह बाजार से नहीं आती थी, बल्कि घर की खेती से तैयार होती थी।

ओखली-जंदरी में तैयार होता था श्राद्ध का सामान

पहाड़ के घरों में ओखली और जंदरी में अनाज कूटने-पीसने की परंपरा श्राद्ध की तैयारियों का अहम हिस्सा होती थी। महिलाएं और परिवार के सदस्य मिलकर पितरों के लिए आवश्यक खाद्य सामग्री तैयार करते थे। यह पूरी प्रक्रिया केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि सामूहिक श्रम और पारंपरिक पहाड़ी जीवनशैली का हिस्सा थी।

तर्पण के लिए बदरी गाय का दूध, धूप के लिए कोयले अथवा गाय के गोबर के उपले में घी डालने की परंपरा थी। पितरों के लिए दान सामग्री तथा जौ-तिल जैसी पूजन सामग्री रखने के लिए मालू और तिमला के पत्तों से पुड़की तैयार की जाती थी।

तर्पण के लिए भी थी स्थानीय परंपरा

तर्पण के लिए एक विशेष प्रकार के पुष्प का इस्तेमाल किया जाता था, जिसे स्थानीय बोलियों में अलग-अलग नामों से जाना जाता था। कई स्थानों पर इसे ‘गूम का फूल’ कहा जाता था। सुबह स्नान से पहले सिर के बाल उस्तरे से साफ करने, स्नान के बाद ताजा कुशा लाने और फिर पंडित के माध्यम से तर्पण व पिंडदान कराने की परंपरा रही है।

इसके बाद श्राद्ध में तैयार भोजन सबसे पहले गाय और कौवे को जिमाने की परंपरा थी। पितरों के निमित्त चुलखांदू में भोजन रखने के बाद पंडित और अन्य लोगों को भोजन कराया जाता था। इन परंपराओं के पीछे धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान की भावना भी जुड़ी हुई थी।

16 दिनों तक श्रद्धा से मनाया जाता था श्राद्ध पक्ष

पहाड़ में श्राद्ध पक्ष के 16 दिन परिवार और गांव के लिए विशेष महत्व रखते थे। हर दिन की अपनी मान्यता और विधि थी। घर की महिलाएं पारंपरिक खाद्य सामग्री तैयार करती थीं और परिवार के बड़े-बुजुर्ग अगली पीढ़ी को परंपराओं की जानकारी देते थे।

लेकिन आज परिस्थितियां तेजी से बदल गई हैं। खेती सिमट गई, ओखली-जंदरी की आवाजें खामोश हो गईं और मालू-तिमला की पुड़की जैसी परंपराएं भी कई जगह केवल यादों में रह गई हैं।

पलायन ने बदली गांवों की तस्वीर

पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन का असर धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं पर भी दिखाई दे रहा है। कभी जिन गांवों में श्राद्ध पक्ष के दौरान घर-घर चहल-पहल रहती थी, वहां आज कई मकान बंद पड़े हैं। खेती योग्य जमीन बंजर हो रही है और स्थानीय अनाज व पारंपरिक खाद्य सामग्री का इस्तेमाल लगातार कम होता जा रहा है।

कभी घर की पहचान मानी जाने वाली गायें भी अब कई जगह सड़कों पर भटकती नजर आती हैं। वहीं श्राद्ध परंपरा में विशेष महत्व रखने वाले कौवे भी कई क्षेत्रों में पहले की तुलना में कम दिखाई देते हैं।

आखिर हम किस ओर जा रहे हैं?

श्राद्ध पक्ष की ये परंपराएं केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं थीं। इनके भीतर पहाड़ की कृषि व्यवस्था, खान-पान, पशुपालन, लोकज्ञान, प्रकृति और पूर्वजों के प्रति सम्मान की पूरी जीवनशैली समाहित थी। आधुनिकता के दौर में बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन सवाल यह है कि कहीं विकास और पलायन की दौड़ में हम अपनी जड़ों को ही तो नहीं खोते जा रहे?

आज जरूरत इस बात की है कि नई पीढ़ी को इन परंपराओं की जानकारी दी जाए और जो परंपराएं वैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, उन्हें दस्तावेज के रूप में संरक्षित किया जाए।

क्योंकि सवाल सिर्फ श्राद्ध की एक परंपरा के खत्म होने का नहीं है, सवाल हमारी उस पहाड़ी संस्कृति का है जिसे हमारे पुरखों ने पीढ़ियों तक संभालकर रखा था।

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