उत्तराखंड की दिव्य धरती पर शिक्षा के साथ विद्या और संस्कृति के साथ प्रकृति का संदेश
श्रीमती मंजीरा देवी इंटरनेशनल स्कूल के विद्यार्थियों से पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती एवं डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती ने किया संवाद
उत्तरकाशी। देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरती केवल हिमालय, नदियों और हरे-भरे वनों के लिए ही नहीं, बल्कि ऋषि परंपरा, संस्कारों और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की संस्कृति के लिए भी जानी जाती है। इसी भाव के साथ परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी ने उत्तरकाशी स्थित श्रीमती मंजीरा देवी इंटरनेशनल स्कूल के विद्यार्थियों से संवाद कर उन्हें शिक्षा के साथ विद्या, आधुनिकता के साथ आध्यात्मिकता और विकास के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश दिया।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि “शिक्षा तब पूर्ण होती है, जब वह हमारे जीवन में संस्कार, संवेदना, सेवा और सद्भाव बनकर उतरती है।” विद्यालय ज्ञान देता है, जबकि विद्या उस ज्ञान का उपयोग स्वयं, समाज और प्रकृति के कल्याण के लिए करना सिखाती है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के बच्चों के लिए प्रकृति स्वयं एक खुली पाठशाला है। हिमालय अडिग रहने की प्रेरणा देता है, गंगा निरंतर बहते रहने और सबको जीवन देने का संदेश देती है, जबकि वृक्ष त्याग और देने की संस्कृति सिखाते हैं। यहां की ऋषि परंपरा आत्मचिंतन, साधना और सेवा का मार्ग दिखाती है।
पूज्य स्वामी जी ने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में कितनी भी ऊंची उपलब्धियां हासिल कर ली जाएं, लेकिन यदि भीतर करुणा, प्रकृति के प्रति संवेदना और माता-पिता, गुरुजनों एवं समाज के प्रति सम्मान नहीं है तो सफलता अधूरी है।
उन्होंने कहा कि “प्रकृति हमारी संपत्ति नहीं, हमारी माता है।” हिमालय, नदियां, जंगल, जल और मिट्टी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से प्लास्टिक का कम उपयोग करने, जल संरक्षण, वृक्षारोपण और विद्यालय व आसपास के क्षेत्रों को स्वच्छ रखने का संकल्प लेने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि आज दुनिया को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है, जो ज्ञानवान होने के साथ संस्कारवान, आधुनिक होने के साथ अपनी जड़ों से जुड़े और सफल होने के साथ संवेदनशील हों। उत्तराखंड की युवा पीढ़ी आधुनिक विकास और प्रकृति संरक्षण के बीच संतुलन का उदाहरण पूरे विश्व के सामने प्रस्तुत कर सकती है।
वहीं डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी ने विद्यार्थियों से संवाद करते हुए कहा कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है अपने भीतर की आवाज को सुनना और जीवन को एक सुंदर उद्देश्य देना। शिक्षा अनेक अवसर प्रदान करती है, लेकिन संस्कार सही दिशा दिखाते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को माता-पिता, गुरुजनों और अपनी संस्कृति के प्रति कृतज्ञ रहने का संदेश दिया।
साध्वी जी ने कहा कि आज का युवा डिजिटल दुनिया से जुड़ा है और उसके पास ज्ञान के अनेक स्रोत उपलब्ध हैं, लेकिन वास्तविक ज्ञान केवल सूचनाएं एकत्र करने से प्राप्त नहीं होता। ज्ञान तब विद्या बनता है, जब वह व्यवहार में प्रेम, धैर्य, अनुशासन और करुणा के रूप में दिखाई दे।
इस अवसर पर विद्यार्थियों ने पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी के साथ संवाद किया। विद्यार्थियों ने शिक्षा, आध्यात्मिकता, प्रकृति, पर्यावरण और जीवन-मूल्यों से जुड़े विषयों पर प्रेरणादायी विचार प्राप्त किए। कार्यक्रम के दौरान बच्चों में उत्साह, जिज्ञासा और आत्मीयता का वातावरण बना रहा।
