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योग की ज्ञान-परंपरा का गंगा-सागर संगम, मुंबई में सजा ज्ञान, साधना और सेवा का मंच

मुंबई। भारत की सनातन संस्कृति में योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की साधना नहीं, बल्कि मन, प्राण, चेतना और आत्मा को परम सत्य से जोड़ने वाली जीवन-पद्धति है। इसी योग परंपरा, गुरु-शिष्य परंपरा और सेवा के भाव को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से मुंबई स्थित द योग इंस्टीट्यूट में प्रेरणादायी संध्या का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती, पूज्य मां हंसाजी और पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती का सान्निध्य रहा।

कार्यक्रम में पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि योग भारत की विश्व को दी गई महानतम आध्यात्मिक विरासतों में से एक है। योग का संदेश केवल स्वस्थ शरीर तक सीमित नहीं, बल्कि एकता, समरसता, शांति, करुणा और आत्म-जागरण का संदेश है। वर्तमान समय की चुनौतियों के बीच योग व्यक्ति को स्वयं, प्रकृति और समस्त सृष्टि से पुनः जोड़ने का मार्ग दिखाता है।

उन्होंने कहा कि भारतीय योग परंपरा का मूल भाव ‘मैं’ से ‘हम’ और ‘हम’ से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की यात्रा है। योग तभी पूर्ण है, जब साधना सेवा में और सेवा करुणा में परिणत हो।

पूज्य मां हंसाजी ने योगमय जीवन के तीन सरल सूत्र मुस्कान, सम्मान और योगदान बताए। उन्होंने कहा कि योग केवल आसन और प्राणायाम तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका प्रभाव व्यक्ति के विचार, व्यवहार और जीवन में दिखाई देना चाहिए। मुस्कान से वातावरण में आनंद, सम्मान से संबंधों में माधुर्य और योगदान की भावना से जीवन सेवा का माध्यम बनता है।

वहीं पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती ने अष्टांग योग की आध्यात्मिक यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि को साधक की आंतरिक यात्रा के विभिन्न चरण बताते हुए कहा कि योग शरीर से श्वास, श्वास से मन, मन से चेतना और चेतना से आत्मबोध की ओर ले जाने वाली यात्रा है।

इस अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने योग के क्षेत्र में पूज्य मां हंसाजी के दीर्घकालीन योगदान के लिए उन्हें रुद्राक्ष का पौधा और शॉल भेंट कर सम्मानित किया। उनके सुपुत्र ऋषि जी एवं पुत्रवधू प्राणी जी को भी शॉल भेंट कर आशीर्वाद प्रदान किया गया।

विश्व नदी दिवस पर दिया जल संरक्षण का संदेश

विश्व नदी दिवस के अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने ‘नदियां हैं तो दुनिया है, जल नहीं तो जीवन नहीं’ का संदेश दिया। उन्होंने नदियों के संरक्षण और जल के महत्व के प्रति जन-जागरूकता का आह्वान किया।

अशोक सिंघल को दी श्रद्धांजलि

हिन्दुत्व जागरण के प्रखर सूत्रधार श्रद्धेय अशोक सिंघल की जयंती पर पूज्य स्वामी जी ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने अशोक सिंघल से जुड़ी आत्मीय स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि उनका जीवन सनातन संस्कृति, राष्ट्र चेतना और समाज जागरण के प्रति समर्पित रहा। उनके विचार, तप, त्याग और संकल्प आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देते रहेंगे।

पर्यटन को बताया संस्कृति और जड़ों से जुड़ने का माध्यम

विश्व पर्यटन दिवस पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि भारत का पर्यटन केवल देखने का नहीं, बल्कि जानने, समझने और जीने का अवसर है। भारत में यात्रा केवल पर्यटन नहीं, बल्कि तीर्थाटन भी है, जो व्यक्ति को प्रकृति, संस्कृति, आध्यात्मिकता और अपनी जड़ों से जोड़ते हुए भीतर की यात्रा का अवसर प्रदान करता है।

कार्यक्रम में योग, साधना, सत्संग, संस्कृति और सेवा के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने का संदेश दिया गया।यदि चाहें तो मैं इसका दमदार अखबार शीर्षक + उपशीर्षक, सोशल मीडिया पोस्ट और 30-सेकेंड की वॉयस न्यूज भी बना सकता हूं।

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