ऋषिकेश

हिमालय है तो हम हैं, हमारी संस्कृति, सभ्यता और सुरक्षा का आधार : स्वामी चिदानन्द सरस्वती

हिमालय का संरक्षण मां गंगा और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण से अभिन्न रूप से जुड़ा : स्वामी चिदानन्द

ऋषिकेश। हिमालय दिवस के अवसर पर परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि हिमालय केवल पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि भारत की जीवन-परंपरा, आध्यात्मिक चेतना और भविष्य की सुरक्षा का आधार है। उन्होंने हिमालय को ‘पृथ्वी का मौन उपनिषद्’ बताते हुए कहा कि इसका मौन मानव को धैर्य, स्थिरता और आत्मसंयम का संदेश देता है।

उन्होंने कहा कि हिमालय की ऊंचाइयों पर पड़ने वाली सूर्य की पहली किरण प्रकृति के माध्यम से ऊंचा उठने के साथ विनम्र बने रहने का संदेश देती है। हिमालय बिना किसी अपेक्षा के नदियों को जन्म देता है, वनों को आश्रय देता है और असंख्य जीव-जंतुओं के जीवन का आधार बनता है। उसका अस्तित्व हमें यह सिखाता है कि जीवन की महानता केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि समूची मानवता के लिए समर्पित होने में है।

प्रकृति और आध्यात्मिकता का संगम है हिमालय

स्वामी चिदानन्द ने कहा कि हिमालय देवभूमि है, जहां प्रकृति और आध्यात्मिकता के बीच कोई अलगाव नहीं है। यहां पर्वत तपस्या के प्रतीक हैं और नदियां केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि जीवन और करुणा का प्रवाह हैं। हिमालय की गोद में स्थित तीर्थ, आश्रम और साधना स्थल भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को जीवंत रखते हैं, जिसमें पृथ्वी को माता, नदियों को जीवनदायिनी और समस्त सृष्टि को एक परिवार माना गया है।

उन्होंने कहा कि मां गंगा की प्रत्येक धारा हिमालय की मौन तपस्या का प्रसाद है। गंगा का प्रवाह केवल जल का प्रवाह नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति, आस्था और जीवन-व्यवस्था का प्रवाह भी है। हिमनद, बर्फ, वर्षा और वन मिलकर उन जल स्रोतों को पोषित करते हैं, जिन पर कृषि, पेयजल, ऊर्जा और करोड़ों लोगों का जीवन निर्भर है। इसलिए हिमालय का संरक्षण गंगा और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण से सीधे जुड़ा हुआ है।

विकास और प्रकृति में संतुलन जरूरी

स्वामी चिदानन्द ने कहा कि हिमालय की सुरक्षा का अर्थ केवल उसकी चोटियों की रक्षा करना नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र को समझना है। वन, हिमनद, झीलें, नदियां, मिट्टी, वन्यजीव और स्थानीय समुदाय एक-दूसरे से जुड़े हैं। किसी एक कड़ी के कमजोर होने से पूरा जीवन चक्र प्रभावित हो सकता है।

उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते पर्यावरणीय दबाव, वनों के क्षरण, जल स्रोतों के प्रदूषण और अनियोजित विकास पर चिंता जताते हुए विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि ऐसी जीवनशैली अपनानी होगी जिसमें विकास हो, लेकिन विनाश नहीं; सुविधा हो, लेकिन संवेदनहीनता नहीं और प्रगति हो, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं।

उन्होंने कहा कि हिमालय को बचाना केवल पर्यावरण की रक्षा करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के धैर्य, शुचिता और चेतना को बचाना भी है। हिमालय की रक्षा के साथ जल, अन्न, जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा होगी।

स्वामी चिदानन्द ने हिमालय दिवस पर लोगों से संकल्प लेने का आह्वान करते हुए कहा, “हिमालय बचेगा तो नदियां बहेंगी, नदियां बहेंगी तो सभ्यता सांस लेगी।” उन्होंने कहा कि स्वस्थ हिमालय ही सुरक्षित, समृद्ध और टिकाऊ भविष्य की नींव है।

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