जनकवि गिर्दा की पुण्यतिथि पर विशेष लेख
जनकवि गिर्दा की पुण्यतिथि पर विशेष लेख
पहाड़ की पीड़ा, प्रकृति की पुकार और जनभावनाओं के स्वर थे गिर्दा
उत्तराखंड की धरती ने अनेक ऐसे रचनाकारों को जन्म दिया, जिन्होंने अपनी लेखनी और आवाज से पहाड़ की संवेदनाओं को देश-दुनिया तक पहुंचाया। इनमें जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। गिर्दा केवल कवि या गीतकार नहीं थे, बल्कि वे पहाड़ के आम आदमी की आवाज थे। उनकी कविताओं और जनगीतों में उत्तराखंड के गांव, जंगल, नदियां, पहाड़, पलायन, बेरोजगारी और सामाजिक संघर्ष जीवंत दिखाई देते हैं।

गिर्दा का साहित्य किसी बंद कमरे में बैठकर लिखी गई कल्पना नहीं था। उन्होंने समाज को करीब से देखा, उसकी पीड़ा को महसूस किया और फिर उसे अपनी रचनाओं में स्वर दिया। यही कारण है कि उनके गीत जनसभाओं से लेकर आंदोलनों तक लोगों की जुबान पर चढ़ गए।
उत्तराखंड आंदोलन की बुलंद आवाज
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौर में गिर्दा के गीतों ने आंदोलनकारियों में नई ऊर्जा भरने का काम किया। उनके गीतों में पहाड़ के अधिकार, अस्मिता और बेहतर भविष्य की आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती थी। उन्होंने जनता की आवाज को कविता का रूप दिया और कविता को जनआंदोलन की ताकत बनाया।
गिर्दा का मानना था कि पहाड़ की असली ताकत उसकी जनता, उसकी संस्कृति और उसकी प्रकृति में है। इसलिए उनकी रचनाओं में व्यवस्था से सवाल भी हैं और अपने समाज को जगाने की पुकार भी।
‘बेड़ु पाको’ से आगे की पहचान
गिर्दा ने उत्तराखंडी लोकधुनों और लोकभाषा को आधुनिक सामाजिक चेतना से जोड़ा। उनके गीतों ने लोकसंस्कृति को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामाजिक बदलाव की आवाज बनाया।
उनकी रचनाओं में पहाड़ का सौंदर्य जितना दिखाई देता है, उतनी ही गहराई से पहाड़ की समस्याएं भी सामने आती हैं। गांवों से लगातार हो रहा पलायन, खाली होते खेत, बेरोजगारी और बदलती सामाजिक परिस्थितियां उनकी चिंता का हिस्सा थीं।
प्रकृति के कवि
गिर्दा के लिए पहाड़ केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं था। वह एक जीवंत संस्कृति और संवेदना थी। जंगल, बुरांश, नदी, बारिश, बादल और पहाड़ी जीवन उनकी रचनाओं में बार-बार आते हैं। प्रकृति के प्रति उनका प्रेम आज के दौर में और भी प्रासंगिक लगता है, जब पहाड़ पर्यावरणीय संकट, अनियोजित विकास और आपदाओं से जूझ रहा है।
आज भी प्रासंगिक हैं गिर्दा
गिर्दा का निधन 22 अगस्त 2010 को हुआ, लेकिन उनकी आवाज आज भी उत्तराखंड के पहाड़ों में गूंजती है। उनकी पुण्यतिथि केवल एक महान कवि को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उन सवालों पर विचार करने का दिन भी है, जिन्हें उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के सामने रखा था।
आज जब गांव खाली हो रहे हैं, युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जा रहे हैं और पहाड़ की पारंपरिक संस्कृति तेजी से बदल रही है, तब गिर्दा की कविताएं हमें अपने मूल से जुड़ने और अपनी जिम्मेदारियों को समझने की प्रेरणा देती हैं।
जनकवि गिर्दा चले गए, लेकिन उनका शब्द नहीं गया। उनकी कविता आज भी पहाड़ के दुख में आवाज बनकर, संघर्ष में हौसला बनकर और भविष्य के सपनों में उम्मीद बनकर हमारे बीच मौजूद है।
गिर्दा को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके गीतों को केवल गुनगुनाएं नहीं, बल्कि उनमें छिपे संदेश को समझें और अपने पहाड़, अपनी संस्कृति, प्रकृति और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाएं।
जनकवि गिर्दा को उनकी पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन।
