नाग पंचमी प्रकृति के प्रति श्रद्धा और सह-अस्तित्व का सनातन पर्व: स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश। श्रावण मास का प्रत्येक दिन भारतीय संस्कृति में प्रकृति, साधना और शिवत्व से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला नाग पंचमी पर्व प्रकृति के सूक्ष्म जीवों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सह-अस्तित्व की भारतीय चेतना का प्रतीक है।

परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने श्रावण तृतीय सोमवार एवं नाग पंचमी की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में नाग केवल सर्प नहीं, बल्कि शक्ति, संरक्षण, ऊर्जा, उर्वरता और प्रकृति के संतुलन के प्रतीक हैं। भगवान शिव के कंठ में विराजमान नाग, भगवान विष्णु की शय्या शेषनाग और समुद्र मंथन में मंदराचल के साथ वासुकी नाग सनातन परंपरा में नागों के महत्व को दर्शाते हैं।
उन्होंने कहा कि नाग पंचमी से जुड़ी प्रमुख कथाओं में महाभारत काल के राजा जनमेजय के सर्पसत्र और ऋषि आस्तीक की कथा प्रमुख है। राजा परीक्षित की मृत्यु नागराज तक्षक के दंश से हुई थी। इसके बाद राजा जनमेजय ने नागवंश के विनाश के लिए सर्पसत्र यज्ञ शुरू किया। जब नागवंश के अस्तित्व पर संकट आया तो ऋषि आस्तीक ने राजा से यज्ञ रोकने का आग्रह किया। राजा द्वारा दिए गए वचन के अनुसार आस्तीक ने नागों की रक्षा का वर मांगा, जिसके बाद सर्पसत्र रोक दिया गया। इसी घटना को श्रावण शुक्ल पंचमी से जोड़ा जाता है।
घी संक्रांति से जुड़ी लोकपरंपरा
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि उत्तराखंड की लोकपरंपरा में घी संक्रांति/ओलगिया का भी विशेष महत्व है। यह पर्व कृषि, पशुपालन, दुग्ध-समृद्धि और पारस्परिक भेंट की संस्कृति से जुड़ा हुआ है। भाद्रपद के प्रथम दिन मनाए जाने वाले इस लोकपर्व में घी, दूध, दही और फल-सब्जियों के आदान-प्रदान की परंपरा रही है।
उन्होंने कहा कि पहाड़ के पारंपरिक जीवन में घी केवल भोजन का हिस्सा नहीं, बल्कि पशुधन, पोषण और समृद्धि का प्रतीक रहा है। घी संक्रांति हमें प्रकृति से प्राप्त संसाधनों के प्रति कृतज्ञ रहने और अपनी समृद्धि को दूसरों के साथ बांटने का संदेश देती है, जबकि नाग पंचमी प्रकृति के प्रत्येक जीव के अस्तित्व के सम्मान की सीख देती है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि ये दोनों पर्व उत्तराखंड की उस जीवन-दृष्टि को अभिव्यक्त करते हैं, जिसमें धरती, जल, वनस्पति, पशु-पक्षी और मानव एक ही जीवन-परिवार के अंग हैं। उन्होंने लोगों से नदियों, वनों और खेतों को सुरक्षित रखने, जैव विविधता का सम्मान करने तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति को समृद्ध छोड़ने का संकल्प लेने का आह्वान किया।
