फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ: 1971 भारत-पाक युद्ध के महानायक
भारतीय सैन्य इतिहास में जब भी साहस, नेतृत्व और रणनीतिक कौशल की बात होती है, तो सबसे पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का नाम लिया जाता है। 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में जन्मे सैम मानेकशॉ भारतीय सेना के पहले फील्ड मार्शल थे। 1971 के भारत-पाक युद्ध में उनके नेतृत्व और दूरदर्शी सैन्य रणनीति ने भारत को ऐतिहासिक विजय दिलाई।

साल 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक संकट गहराने और लाखों शरणार्थियों के भारत आने से स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सैन्य कार्रवाई चाहती थीं, लेकिन सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ ने स्पष्ट कहा कि युद्ध तभी होगा, जब भारतीय सेना पूरी तरह तैयार होगी। उनका मानना था कि बिना पर्याप्त तैयारी के युद्ध में उतरना सैनिकों के साथ अन्याय होगा।
उन्होंने मानसून समाप्त होने, सैनिकों की तैनाती, हथियारों और रसद की पूरी व्यवस्था सुनिश्चित करने के बाद युद्ध शुरू करने की सलाह दी। दिसंबर 1971 में भारतीय सेना ने सुनियोजित अभियान चलाया और केवल 13 दिनों में पाकिस्तान को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। 16 दिसंबर 1971 को ढाका में लगभग 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया। इसी के साथ बांग्लादेश का जन्म हुआ। यह विश्व इतिहास के सबसे बड़े सैन्य आत्मसमर्पणों में से एक माना जाता है।
सैम मानेकशॉ केवल एक महान सेनापति ही नहीं, बल्कि अपने बेबाक व्यक्तित्व, विनोदप्रिय स्वभाव और सैनिकों के प्रति गहरे सम्मान के लिए भी जाने जाते थे। उनका विश्वास था कि किसी भी सेना की सबसे बड़ी ताकत उसके जवान होते हैं। वे हमेशा अपने सैनिकों का मनोबल ऊँचा रखते थे और हर परिस्थिति में उनका साथ निभाते थे।
देश के प्रति उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें पद्म विभूषण सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए। 1 जनवरी 1973 को उन्हें भारतीय सेना के सर्वोच्च सैन्य पद फील्ड मार्शल की उपाधि से सम्मानित किया गया।
27 जून 2008 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनका साहस, नेतृत्व, राष्ट्रभक्ति और अद्वितीय सैन्य कौशल आज भी भारतीय सेना और देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
जन्मदिवस पर भारत माँ के इस वीर सपूत को शत-शत नमन।
