सिंधु नदी हमारी सभ्यता की जीवनरेखा: स्वामी चिदानन्द सरस्वती
लद्दाख। सिंधु नदी के पावन तट पर परमार्थ निकेतन ऋषिकेश के अध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के सान्निध्य में दिव्य जलाभिषेक एवं भव्य सिंधु आरती का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इन्द्रेश कुमार, महंत दीनदयालु जी, रूपेश कुमार सहित विभिन्न राज्यों से आए संत, श्रद्धालु और युवा बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

वैदिक मंत्रोच्चार, शंखध्वनि और दीपों की अलौकिक छटा के बीच आयोजित सिंधु आरती में श्रद्धालुओं ने माँ सिंधु का जलाभिषेक कर राष्ट्र की समृद्धि, विश्व शांति, मानव कल्याण और पर्यावरण संतुलन की कामना की। इस अवसर पर जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संवर्धन का सामूहिक संकल्प भी लिया गया।
अपने संबोधन में स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि सिंधु केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति, सभ्यता, आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीय अस्मिता का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि ‘हिंद’ और ‘हिंदुस्तान’ जैसे शब्दों का संबंध भी सिंधु से जुड़ा है, इसलिए सिंधु का सम्मान हमारी सांस्कृतिक पहचान का सम्मान है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता का विकास इसी नदी के तट पर हुआ था और आज भी यह नदी भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना और पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणास्रोत बनी हुई है। स्वामी जी ने कहा कि जल जीवन का आधार है तथा नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति की जीवनधाराएँ हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि “नदियाँ हैं तो दुनिया है।” उन्होंने लोगों से नदियों को स्वच्छ, निर्मल और अविरल बनाए रखने का आह्वान करते हुए कहा कि जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने युवाओं से प्लास्टिक प्रदूषण रोकने, जल बचाने और नदियों की स्वच्छता के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि नदियों की सेवा ही मानवता, प्रकृति और ईश्वर की सच्ची सेवा है। यदि आज नदियों के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएं तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित और समृद्ध बनाया जा सकता
