धरती आबा बिरसा मुंडा स्वाभिमान और जनजातीय अस्मिता के अमर प्रतीक: स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश। धरती आबा बिरसा मुंडा के बलिदान दिवस पर परमार्थ निकेतन में आयोजित गंगा आरती के दौरान श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने उन्हें स्वाभिमान, सांस्कृतिक चेतना और जनजातीय अस्मिता का अमर प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा भारतीय इतिहास के ऐसे युगपुरुष हैं, जिनका जीवन आत्मगौरव, आध्यात्मिक जागरण और जनजातीय स्वाभिमान का प्रेरणास्रोत है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि बिरसा मुंडा ने उस दौर में जनजातीय समाज का नेतृत्व किया, जब वह आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक शोषण का सामना कर रहा था। उन्होंने लोगों में आत्मविश्वास जगाया और उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों, आध्यात्मिक शक्ति तथा सामुदायिक गौरव का बोध कराया।
उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा का प्रसिद्ध “उलगुलान” केवल राजनीतिक विद्रोह नहीं था, बल्कि अन्याय के विरुद्ध स्वाभिमान की उद्घोषणा और अधिकारों की रक्षा का महाअभियान था। उनके नेतृत्व ने जनजातीय समाज में आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और जागरूकता की नई चेतना का संचार किया।
स्वामी जी ने कहा कि बिरसा मुंडा में संत की करुणा, ऋषि की दूरदृष्टि और योद्धा का साहस एक साथ विद्यमान था। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि दृढ़ संकल्प, सत्यनिष्ठा और जनकल्याण की भावना से इतिहास की दिशा बदली जा सकती है।
उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा ने प्रकृति और संस्कृति के गहरे संबंध को समझा और जल, जंगल तथा जमीन को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, अस्तित्व और पहचान का आधार माना। उनका संघर्ष पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक अस्मिता और मानवीय गरिमा की रक्षा का संघर्ष था। आज के समय में, जब विश्व सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण पर बल दे रहा है, उनके विचार और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि बिरसा मुंडा कोई व्यक्ति मात्र नहीं, बल्कि एक विचार और चेतना हैं, जो हर युग में अन्याय के विरुद्ध खड़ी होती है तथा सत्य, स्वाभिमान और स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करती है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, जागरण और राष्ट्रनिर्माण का अमूल्य मार्गदर्शन है।
इस अवसर पर परमार्थ निकेतन में विशेष गंगा आरती के माध्यम से धरती आबा बिरसा मुंडा को श्रद्धांजलि अर्पित की गई तथा उनके आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया गया।
