विश्व महासागर दिवस पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती का संदेश, महासागर पृथ्वी के प्राण हैं
ऋषिकेश। विश्व महासागर दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने महासागरों के संरक्षण का आह्वान करते हुए कहा कि महासागर पृथ्वी के फेफड़े और प्राण हैं। यदि उनमें प्लास्टिक और प्रदूषण भर जाएगा तो मानवता की सांसें भी सुरक्षित नहीं रह पाएंगी।

संत श्री मुरलीधर जी महाराज के श्रीमुख से प्रवाहित श्रीरामचरितमानस कथा के अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं संत रामेश्वरानन्द जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित किया। इस दौरान स्वामी जी ने कहा कि एक ओर हम प्रभु श्रीराम की भक्ति और करुणा से ओतप्रोत कथा का श्रवण कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संसार के वास्तविक महासागर मानवीय असंवेदनशीलता और प्रदूषण की पीड़ा झेल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि महासागर केवल जलराशि नहीं, बल्कि पृथ्वी की चेतना और जीवन का आधार हैं। समुद्रों में फेंका गया प्लास्टिक और कचरा अंततः सूक्ष्म कणों के रूप में भोजन, जल और वायु के माध्यम से मानव जीवन को ही प्रभावित करता है। प्रकृति को जो दिया जाता है, वह किसी न किसी रूप में वापस लौटता है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने समुद्र मंथन का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे शास्त्रों में समुद्र को रत्नों का स्रोत बताया गया है, लेकिन आज स्वार्थ और अति-उपभोग की संस्कृति ने समुद्रों को प्रदूषण और पर्यावरणीय संकट का केंद्र बना दिया है। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय संकट वास्तव में संवेदनहीनता और आध्यात्मिक मूल्यों के क्षरण का परिणाम है।
उन्होंने लोगों से एकल-उपयोग प्लास्टिक का त्याग करने, जल का सम्मान करने और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव रखने का आह्वान किया। उनका कहना था कि यदि प्रत्येक व्यक्ति छोटे-छोटे संकल्पों के साथ आगे बढ़े तो महासागरों की रक्षा का वैश्विक जनआंदोलन खड़ा किया जा सकता है।
विश्व महासागर दिवस के अवसर पर पूज्य स्वामी जी ने श्रद्धालुओं एवं राहगीरों की सुविधा के लिए शीतल जल प्याऊ का लोकार्पण भी किया। उन्होंने कहा कि समुद्र हमारे अस्तित्व का मूल स्रोत हैं और उनकी रक्षा करना मानवता के भविष्य की रक्षा करना है।
