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खैरालिंग मुंडनेश्वर महादेव: नमक के भारे से प्रकट हुए महादेव, जहां आज भी जीवित है सदियों पुरानी आस्था

पौड़ी। उत्तराखंड की देवभूमि में अनेक ऐसे सिद्धपीठ हैं, जिनके साथ लोककथाएं, इतिहास और जनआस्थाएं गहराई से जुड़ी हुई हैं। पौड़ी गढ़वाल जनपद के कल्जीखाल ब्लॉक की असवालस्यूं पट्टी में स्थित खैरालिंग मुंडनेश्वर महादेव ऐसा ही एक प्राचीन और जागृत तीर्थस्थल है, जो सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पर्वतीय वातावरण में स्थित यह मंदिर धार्मिक महत्व के साथ-साथ गढ़वाली लोकसंस्कृति और परंपराओं का भी प्रमुख केंद्र है।

प्रसिद्ध घुमक्कड़, इतिहासकार और साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन ने अपने यात्रा-वृत्तांतों में खैरालिंग मेले का उल्लेख करते हुए इसे गोचर मेले के बाद गढ़वाल का दूसरा सबसे बड़ा मेला बताया है। इससे इस मेले की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

नमक के भारे से प्रकट हुए महादेव

खैरालिंग महादेव के प्राकट्य से जुड़ी एक अत्यंत रोचक लोककथा आज भी क्षेत्र में प्रचलित है। मान्यता है कि थैर गांव के निवासी माण्डू थैरवाल व्यापार के सिलसिले में नमक का भारा (बोरा) लेकर लौट रहे थे। रास्ते में सकनोली गांव की सारी नामक स्थान पर उन्होंने विश्राम के लिए नमक का भारा जमीन पर रख दिया।

कुछ देर बाद जब वे घर की ओर जाने लगे तो नमक का भारा उठाने का प्रयास किया, लेकिन वह अपनी जगह से हिला तक नहीं। उन्होंने आसपास के लोगों को बुलाया। पूरा क्षेत्र एकत्र हो गया, लेकिन कोई भी उस भारे को हिला नहीं पाया। अंततः सभी लोग इसे ईश्वरीय संकेत मानकर अपने-अपने घर लौट गए।

उसी रात असवालस्यूं क्षेत्र के तत्कालीन गढ़पति और थोकदार भंधो असवाल को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन दिए और कहा, “मुझे इस स्थान से ऊपर रमणीक चोटी पर स्थापित करो।” अगले दिन ग्रामीणों ने श्रद्धापूर्वक उस दिव्य शक्ति को वर्तमान स्थान पर स्थापित किया, जहां आज खैरालिंग मुंडनेश्वर महादेव का भव्य मंदिर स्थित है।

मुंडनेश्वर और खैरालिंग नाम का रहस्य

स्थानीय गढ़वाली भाषा में “मुंड” का अर्थ सिर या मस्तक होता है। मान्यता है कि यहां स्थापित शिवलिंग भगवान शिव के मस्तक स्वरूप का प्रतीक है, इसलिए इसे मुंडनेश्वर महादेव कहा जाता है।

वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार यह शिवलिंग खैर के वृक्ष के नीचे प्रकट हुआ था। इसी कारण इसका नाम खैरालिंग पड़ा। कुछ लोग शिवलिंग के रंग को खैर की लकड़ी के समान मानते हैं और इसी आधार पर भी इस नाम की उत्पत्ति बताते हैं।

ध्वजाओं की अनोखी परंपरा

खैरालिंग मेले की सबसे आकर्षक परंपराओं में से एक है विभिन्न गांवों द्वारा ध्वजा चढ़ाना। स्थानीय भाषा में इन ध्वजाओं को “निसांण” कहा जाता है। मेले के दौरान दूर-दूर के गांवों से श्रद्धालु अपनी-अपनी ध्वजाएं लेकर मंदिर पहुंचते हैं।

सभी ध्वजाओं को मंदिर परिसर में एक साथ खड़ा किया जाता है और उनकी विशेष पूजा-अर्चना होती है। लोकमान्यता है कि जिस गांव की ध्वजा सबसे ऊंची और लंबी होती है, उसे उस वर्ष विशेष सम्मान और विजय का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा आज भी सामुदायिक एकता और धार्मिक विश्वास का अनूठा उदाहरण है।

पशुबलि से प्रतीकात्मक पूजा तक

खैरालिंग मंदिर में वर्षों तक मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु भैंसे (स्थानीय भाषा में बागी) और बकरों की बलि चढ़ाते थे। यह परंपरा क्षेत्रीय धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा रही है। हालांकि, सरकार के हस्तक्षेप और न्यायालय के निर्देशों के बाद मंदिर में पशुबलि पर रोक लगा दी गई। वर्तमान में श्रद्धालु प्रतीकात्मक रूप से पूजा-अर्चना कर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

गढ़वाल का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महापर्व

पिछले कुछ वर्षों से खैरालिंग मेले का आयोजन प्रतिवर्ष 6 और 7 जून को किया जाता है। दो दिनों तक चलने वाले इस विशाल मेले में हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं। ढोल-दमाऊ की गूंज, लोकजागर, पारंपरिक नृत्य, धार्मिक अनुष्ठान और ध्वजा यात्रा पूरे क्षेत्र को भक्तिमय वातावरण में बदल देते हैं।

जागर परंपरा में महादेव की महिमा का वर्णन विशेष रूप से “स्याळआ झमाको” प्रसंग के माध्यम से किया जाता है, जो गढ़वाल की समृद्ध लोकधार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आस्था, इतिहास और संस्कृति का जीवंत संगम

समुद्र तल से लगभग 1600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित खैरालिंग मुंडनेश्वर महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक स्मृति और लोकआस्था का जीवंत प्रतीक है। सदियों पुरानी कथाएं, परंपराएं और जनविश्वास आज भी यहां उतनी ही श्रद्धा के साथ जीवित हैं, जितने अपने प्रारंभिक काल में रहे होंगे।

यही कारण है कि खैरालिंग मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गढ़वाल की पहचान, लोकसंस्कृति और सामूहिक आस्था का महापर्व माना जाता है।

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