पीवीआर में खाली सीटें देख छलका उत्तराखंडी सिनेमा प्रेमियों का दर्द, ‘मां सुरकंडा’ जैसी फिल्मों को दर्शकों के समर्थन की दरकार
देवभूमि की आस्था, संस्कृति और लोकधरोहर पर आधारित फिल्म को मिल रही सराहना, लेकिन सिनेमाघरों में दर्शकों की कमी चिंता का विषय
देहरादून। गढ़वाली धार्मिक फिल्म “मां सुरकंडा” उत्तराखंड की संस्कृति, आस्था और लोकजीवन को बड़े पर्दे पर सजीव रूप में प्रस्तुत कर रही है। 22 जनवरी 2026 को रिलीज हुई इस फिल्म में टिहरी गढ़वाल के कद्दूखाल स्थित मां सुरकंडा देवी धाम की महिमा, भक्तों की श्रद्धा और उत्तराखंड की सुरम्य वादियों को खूबसूरती से फिल्माया गया है। फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों द्वारा सराहा जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद सिनेमाघरों में अपेक्षित दर्शक नहीं पहुंच रहे हैं।

बुधवार को देहरादून के एक पीवीआर मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने पहुंचे एक दर्शक ने बताया कि पूरा हॉल लगभग खाली था। यह दृश्य देखकर उन्हें दुख हुआ और मन में यह सवाल उठा कि यदि उत्तराखंड के लोग अपनी भाषा, संस्कृति और सिनेमा का समर्थन नहीं करेंगे तो क्षेत्रीय फिल्म उद्योग आगे कैसे बढ़ेगा।
उत्तराखंड की पहली महिला फिल्म निर्देशिका सुशीला रावत के निर्देशन में बनी इस फिल्म का निर्माण पीआर फिल्म्स प्रोडक्शन द्वारा किया गया है। फिल्म में राजेश मालगुड़ी, पुनम सकलानी, सावन गैरोला, दीक्षा बडोनी, राकेश गौर, साक्षी काला, सुशीला रावत और पदम गुसाईं सहित कई कलाकारों ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं।
फिल्म का संगीत भी इसकी बड़ी ताकत माना जा रहा है। संजय कुमोला, विनोद चौहान और सुमित गुसाईं द्वारा तैयार संगीत में उत्तराखंड की लोकधुनों और भक्ति भाव का सुंदर समावेश है। फिल्म का लोकप्रिय गीत “सुरकुट वसानी मां सुरकंडा” दर्शकों के बीच विशेष रूप से पसंद किया जा रहा है।

सांस्कृतिक जानकारों का मानना है कि क्षेत्रीय सिनेमा केवल कलाकारों और निर्माताओं के प्रयासों से नहीं, बल्कि स्थानीय दर्शकों के सहयोग से भी आगे बढ़ता है। यदि उत्तराखंड की जनता अपनी भाषा और संस्कृति पर आधारित फिल्मों को सिनेमाघरों में जाकर देखेगी, तभी गढ़वाली और कुमाऊंनी सिनेमा को नई ऊंचाइयां मिल सकेंगी।
फिलहाल “मां सुरकंडा” केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आस्था, संस्कृति और पहचान को बड़े पर्दे पर सहेजने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है, जिसे दर्शकों के समर्थन की आवश्यकता है।
