पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से बढ़ता चीड़ बना चिंता का विषय, पारंपरिक वनस्पतियां हो रहीं विलुप्त
द्वारीखाल/पौड़ी। गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्रों में चीड़ के पेड़ों का तेजी से बढ़ता विस्तार अब पर्यावरण और पारंपरिक वन संपदा के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है। पहले जहां चीड़ के पेड़ मुख्यतः ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाते थे, वहीं अब इनका फैलाव धीरे-धीरे निचले इलाकों और नदी किनारे तक पहुंच गया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन क्षेत्रों में चीड़ के जंगल अधिक हो गए हैं, वहां पारंपरिक और उपयोगी पेड़-पौधों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाने वाले बांज, बुरांश, काफल और आंवला जैसे महत्वपूर्ण पेड़ों की संख्या तेजी से घट रही है। वहीं निचले इलाकों में धौड़, कॉल्दों, गींठी, तिमला, मेलू, मालू और आंवला जैसे पारंपरिक पेड़-पौधे भी अब विलुप्ति की कगार पर पहुंच गए हैं।
पारंपरिक पेड़ों की कमी का सीधा असर पर्यावरण और स्थानीय जीवन पर भी पड़ रहा है। इन पेड़ों के कम होने से क्षेत्र के कई प्राकृतिक जलस्रोत सूखने लगे हैं और जंगलों में मिलने वाले जंगली फल लगभग समाप्त हो चुके हैं, जो कभी ग्रामीणों के लिए पोषण और आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत हुआ करते थे।
विशेषज्ञों के अनुसार चीड़ की पत्तियां अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं, जिससे गर्मियों के मौसम में जंगलों में आग लगने की घटनाएं तेजी से बढ़ जाती हैं और बड़े क्षेत्र के जंगल जलकर नष्ट हो जाते हैं। बताया जाता है कि अंग्रेजों के शासनकाल में चीड़ को मुख्य रूप से लीसा (रेजिन) उत्पादन और रेल लाइन के लिए स्लिपर तैयार करने के उद्देश्य से लगाया गया था। इसे भारत की मूल वनस्पति नहीं माना जाता।
वर्तमान समय में न तो लीसा उत्पादन पहले की तरह हो रहा है और न ही चीड़ की लकड़ी का व्यापक उपयोग इमारती कार्यों में हो रहा है। इसके बावजूद चीड़ के पेड़ों के कटान और चिरान पर रोक होने के कारण हर साल बड़ी संख्या में सूखे या गिरे हुए पेड़ जंगलों में ही सड़ जाते हैं या आग की भेंट चढ़ जाते हैं।

स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि सरकार चीड़ के पेड़ों के सीमित कटान और चिरान की अनुमति दे दे, तो इससे एक ओर चीड़ के अत्यधिक विस्तार पर नियंत्रण लगाया जा सकेगा और दूसरी ओर स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। साथ ही मजदूरों को काम, सरकार को राजस्व और पर्यावरण को भी राहत मिल सकती है।
