लोकपर्व जागड़ा और महासू देवता
उत्तराखण्ड और हिमाचल की सांस्कृतिक परंपराएँ अपनी विविधता और आस्था के लिए जानी जाती हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक प्रमुख पर्व है जागड़ा, जो विशेष रूप से महासू देवता की पूजा-अर्चना से जुड़ा हुआ है।

जागड़ा पर्व का महत्व
जागड़ा शब्द का अर्थ है – जागर या जागरण करना। यह पर्व रात्रि भर गीत-संगीत, लोकनृत्य और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मनाया जाता है। गांव-गांव में ढोल-दमाऊ, रणसिंगा और स्थानीय वाद्ययंत्रों की ध्वनि वातावरण को भक्ति और उत्साह से भर देती है। ग्रामीण अपने इष्ट देवता को जागृत करने के लिए लोकगायक और जागरिया (गाथा गाने वाले) को बुलाते हैं, जो पौराणिक आख्यान और देव कथाएँ सुनाते हैं।
महासू देवता और उनका लोकविश्वास
महासू देवता को न्याय के देवता और क्षेत्रपाल माना जाता है। लोकविश्वास है कि चार भाई—बशिक, पबासिक, बुठा और चाल्दा—मिलकर महासू देवता की शक्ति के रूप में विराजमान हैं। ये देवता विशेषकर जौनसार-बाबर, रंवाई और उत्तरकाशी-पौड़ी के सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रमुख आस्था के केंद्र हैं।
ग्रामीण मानते हैं कि महासू देवता अन्याय का नाश कर धर्म की रक्षा करते हैं। विवाद और झगड़े की स्थिति में लोग आज भी देवता के दरबार में न्याय की गुहार लगाते हैं।
सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष
जागड़ा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह सामूहिक मेल-मिलाप और सामाजिक एकजुटता का पर्व भी है। गांव के लोग एक साथ जुटकर देवगाथाएँ सुनते हैं, नृत्य करते हैं और रातभर गीतों का आनंद लेते हैं। इससे नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का अवसर मिलता है।
निष्कर्ष
लोकपर्व जागड़ा और महासू देवता की उपासना पहाड़ की लोकसंस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। यह पर्व न केवल आस्था का प्रतीक है बल्कि सामुदायिक एकता, न्याय और परंपरा की जड़ों से जुड़ने का अवसर भी प्रदान करता है।
