उत्तराखंडपौड़ी

पंचायत चुनाव बाद का सन्नाटा, ठगा महसूस कर रहे मतदाता,

द्वारीखाल–कल्जीखाल में रोमांचक मुकाबले से बढ़ी हलचल

पौड़ी गढ़वाल। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव संपन्न हो चुके हैं। ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव के बाद अब राजनीतिक हलचल धीरे-धीरे कम होती नजर आ रही है। लेकिन मतदाताओं के बीच असंतोष साफ झलक रहा है।

क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत सदस्य चुनने के बाद कई मतदाताओं ने खुद को ठगा हुआ महसूस किया। उनका कहना है कि चुनाव परिणाम आने के बाद नवनिर्वाचित सदस्य अपने क्षेत्र में नजर नहीं आए। जबकि अधिकतर ग्राम प्रधान मतदाताओं को घर-घर जाकर धन्यवाद दे रहे हैं, वहीं जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत सदस्य गायब से हो गए हैं।

गांव-गांव से उठ रही आवाज़ यह है कि ये सदस्य अक्सर ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष से सौदेबाज़ी कर किनारे हो जाते हैं। मतदाताओं की राय है कि ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जनता द्वारा सीधे और खुला मतदान से होना चाहिए, ताकि खरीद-फरोख्त और अपहरण जैसी चर्चाओं पर रोक लगे और निष्पक्ष चुनाव हो सके।

द्वारीखाल–कल्जीखाल: कांटे की टक्कर :

इसी क्रम में इस बार द्वारीखाल और कल्जीखाल ब्लॉक प्रमुख पद पर बेहद रोमांचक मुकाबला देखने को मिला। राजनीति के दिग्गज महेंद्र सिंह राणा, जो पिछले चुनाव में द्वारीखाल से स्वयं और पत्नी बीना राणा कल्जीखाल से निर्विरोध निर्वाचित हुए थे, इस बार जीत दर्ज करने के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा।

कल्जीखाल से राणा समर्थित उम्मीदवार गीता देवी और द्वारीखाल से उनकी पत्नी बीना राणा ने मात्र एक-एक वोट से जीत हासिल की। इस नतीजे ने दिखा दिया कि इस बार मैदान कितना कठिन था और महेंद्र सिंह राणा की टीम को सचमुच “लोहे के चने चबाने” पड़े।

उषा बडोला का नेतृत्व भाव :

प्रतिद्वंदी उषा बडोला ने पूरे दमखम से चुनाव लड़ा। उनकी टीम ने साबित किया कि मेहनत और लगन से किया गया संघर्ष किसी भी बड़े नेता को चुनौती दे सकता है। मतगणना के बाद उन्होंने सहजता से कहा—

“मैं एक वोट से हार गई।”

न चेहरे पर शिकन, न कोई द्वेष—उनका यह परिपक्व रवैया उनकी नेतृत्व क्षमता और भविष्य की संभावनाओं को उजागर करता है। उन्होंने हार को सहर्ष स्वीकार कर क्षेत्रीय राजनीति में नई मिसाल पेश की।

महेंद्र सिंह राणा के लिए चेतावनी की घंटी :

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार का चुनाव राजनीति के सूरमा कहे जाने वाले महेंद्र सिंह राणा के लिए आसान नहीं रहा। यह जीत भले ही उनके खाते में दर्ज हो गई हो, लेकिन यह उन्हें भविष्य में विकास की परिभाषा पर नए सिरे से चिंतन और रणनीति बनाने का स्पष्ट संदेश देती है।

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