कारगिल विजय दिवस पर परमार्थ निकेतन में वीर बलिदानियों को श्रद्धांजलि
स्वामी चिदानन्द सरस्वती बोले – “सैनिक वेतन नहीं, वतन के लिए लड़ते हैं”
ऋषिकेश। कारगिल विजय दिवस के अवसर पर आज परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश में एक भावपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में ऋषिकुमारों ने हाथों में तिरंगा लेकर कारगिल युद्ध के वीर बलिदानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

विशेष रूप से आयोजित गंगा आरती को कारगिल युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए रणबाँकों को समर्पित किया गया, जिन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अद्वितीय शौर्य और पराक्रम का परिचय दिया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने संदेश में कहा, “हमारे सैनिक किसी वेतन के लिए नहीं, बल्कि वतन के लिए लड़ते हैं। वे हमारी नींद, हमारी आज़ादी और तिरंगे की शान के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं।”
उन्होंने कहा कि जो वीर बर्फीली चोटियों पर लहू बहाते हैं, वे किसी सम्मान या स्वार्थ से नहीं, बल्कि माँ भारती के लिए मर-मिटने के भाव से प्रेरित होते हैं।
स्वामी जी ने कहा, “कारगिल विजय दिवस केवल एक युद्ध की याद नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की विजय का प्रतीक है। यह हर भारतीय के भीतर राष्ट्रप्रेम की लौ को प्रज्वलित करता है। यह भारत की उस चेतना की उद्घोषणा है जो हिमालय से ऊँची, गंगा से पवित्र और तिरंगे जैसी गौरवशाली है।”
उन्होंने भारतीय सेना की निष्ठा को नमन करते हुए कहा कि,
“सैनिकों का वाक्य – या तो तिरंगा लहराकर आऊँगा या उसमें लिपटकर – केवल शब्द नहीं, बल्कि अद्वितीय राष्ट्रप्रेम की जीवंत अभिव्यक्ति है।”
स्वामी जी ने 1999 के कारगिल युद्ध को भारतीय सेना के अद्वितीय पराक्रम का उदाहरण बताया और कहा कि “कारगिल की लड़ाई केवल सामरिक विजय नहीं थी, बल्कि यह हर भारतीय के दिल में एकता, शौर्य और आत्मबल का संदेश छोड़ गई। यह लड़ाई आज भी भारत को संगठित रहने की प्रेरणा देती है।”
कार्यक्रम में मौजूद सभी श्रद्धालुओं और ऋषिकुमारों ने शहीदों को शत-शत नमन करते हुए कहा कि हम उन वीरों को नहीं भूल सकते जिनकी रगों में रक्त नहीं, बल्कि मातृभूमि के लिए समर्पण बहता था।
