हरेला – हरियाली, संस्कृति और चेतना का प्रतीक

उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना में कुछ पर्व केवल उत्सव नहीं होते, वे जीवनशैली, पर्यावरण संतुलन और समाज की गहराइयों से जुड़े होते हैं। हरेला ऐसा ही एक लोकपर्व है—जो केवल बीजों के अंकुरण का प्रतीक नहीं, बल्कि हरित चेतना, पारंपरिक कृषि का सम्मान, और सामुदायिक एकता का जीवंत उदाहरण है।
हरेला का शाब्दिक अर्थ ही है हरियाली का आगमन—यह केवल ऋतुपरिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के बीच के बंधन को फिर से जागृत करने का एक मौलिक प्रयास है। विशेष रूप से जब हम जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक असंतुलन और सामाजिक बिखराव के दौर से गुजर रहे हैं, तब हरेला जैसे पर्वों की प्रासंगिकता और गहराई से समझने की आवश्यकता और अधिक हो जाती है।
🌿 इतिहास और सांस्कृतिक मूल
हरेला पर्व की जड़ें उत्तराखंड के कुमाऊँ और गढ़वाल अंचलों में हजारों वर्षों से गहराई तक फैली हुई हैं। यह पर्व श्रावण मास की कर्क संक्रांति को मनाया जाता है और नवजीवन, उपज, हरियाली और समृद्धि का प्रतीक है। परंपरा के अनुसार, श्रावण हरेला से नौ-दस दिन पूर्व घरों में गेहूं, जौ, भट्ट, उड़द, गहत, सरसों आदि बीज मिट्टी में बोए जाते हैं। जिस दिन ये अंकुरित होते हैं, उस दिन पर्व मनाया जाता है।
संयुक्त परिवारों में यह एक ऐसा समय होता था जब बुजुर्गों का आशीर्वाद, बच्चों की उत्सुकता, और प्राकृतिक विश्वास एकसाथ पनपते थे। उस दिन घरों में लोकगीत गाए जाते, देवताओं को पूजन हेतु बुलाया जाता, और “हरेला” को परिवार के सभी सदस्यों के कान के पीछे लगाकर आशीर्वाद स्वरूप प्रदान किया जाता था।
🌾 कृषि और पर्यावरणीय दृष्टिकोण
हरेला की वैज्ञानिक दृष्टि उतनी ही गहरी है जितनी उसकी सांस्कृतिक। बीजों का अंकुरण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरता और बीजों की गुणवत्ता का पारंपरिक परीक्षण है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि कृषि केवल व्यवसाय नहीं, संस्कृति और प्रकृति के बीच संवाद है।
हरेला के दिन किए जाने वाले पौधरोपण कार्यक्रम आज के संदर्भ में और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। यह न केवल हरियाली का प्रतीक है, बल्कि एक जलवायु-साक्षरता अभियान जैसा है, जो हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही जीवन की स्थिरता का आधार है।
🏡 सामाजिक समरसता और आधुनिक संदर्भ
हरेला पर्व की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह सांप्रदायिक नहीं, सामाजिक पर्व है। इसमें जाति, वर्ग, आयु, लिंग जैसी कोई सीमा नहीं होती। हर कोई इसमें सहभागी होता है—बच्चे बीज बोते हैं, महिलाएं पूजा करती हैं, बुजुर्ग आशीर्वाद देते हैं, और युवा पौधारोपण करते हैं।
आज, जब आधुनिकता ने परंपरा से दूरी बढ़ा दी है, तब हरेला जैसी परंपराएं एक पुल का कार्य कर सकती हैं। विद्यालयों में हरेला को पाठ्यक्रम से जोड़ना, गांवों में सामूहिक पौधरोपण अभियान, शहरों में बगीचों और छतों पर “हरेला वाटिका” बनाना — यह सब उन मूल्यों को फिर से जीवंत कर सकते हैं जो आज के समाज को चाहिए।
📜 शास्त्रीय और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य
भारतीय दर्शन में ऋतुओं, वृक्षों और पंचमहाभूतों को देवतुल्य माना गया है। वृक्षाय नमः, अन्नं ब्रह्म जैसे वैदिक मंत्र प्रकृति के प्रति उस श्रद्धा को दर्शाते हैं जो हमारी संस्कृति की आत्मा है।
हरेला इसी परंपरा का स्थानीय रूपांतरण है—जो न केवल गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक है, बल्कि सतत विकास और पर्यावरणीय न्याय के आदर्शों का भी लोक रूप है। इसमें पर्यावरण, जीवन, भोजन और भविष्य — सबका संतुलन छिपा है।
🌱 भविष्य की दिशा
उत्तराखंड सरकार और अनेक संस्थाएं हरेला को जन-आंदोलन के रूप में विकसित कर रही हैं, जो अत्यंत सराहनीय प्रयास है। लेकिन केवल एक दिन पौधरोपण कर देने से उद्देश्य सिद्ध नहीं होता। हमें इसे वर्ष भर की हरी जीवनशैली में बदलने की आवश्यकता है।
हरेला को शहरों में भी अपनाया जाना चाहिए — छतों पर बागवानी, बालकों में बीज बोने की परंपरा, हाउसिंग सोसाइटी में सामूहिक पौधारोपण, और स्थानीय शास्त्रीय गीतों के माध्यम से जनचेतना को बढ़ावा देना — यही पर्व की सच्ची पुनःस्थापना होगी।
✨ हरेला का संदेश
हरेला केवल बीज बोने का पर्व नहीं, यह एक आह्वान है — कि हम अपने भीतर और बाहर हरियाली उगाएं।
हरेला हमें सिखाता है कि विकास का रास्ता, परंपरा और प्रकृति दोनों के साथ चलकर ही टिकाऊ बनता है।
आज जब हम वैश्विक जलवायु संकट और सामाजिक विभाजन से जूझ रहे हैं, तब हमें हरेला जैसे पर्वों से वह शांति, स्थिरता और सामूहिकता की शिक्षा मिलती है, जिसकी समाज को सबसे अधिक आवश्यकता है।
📌 यदि उत्तराखंड और भारत को आत्मनिर्भर बनाना है, तो हरेला जैसे पर्वों के मर्म को जीवनशैली बनाना होगा — तभी होगा सतत विकास, और तभी खिलेंगे हरे अंकुर, हर मन में।
— योगेश बलूनी
संस्थापक, बद्री फाउंडेशन
(सामाजिक कार्यकर्ता एवं लोक संस्कृति शोधार्थी)
