श्रीरामचरितमानस अखंड पाठ का भावपूर्ण समापन, विशाल संत भंडारे के साथ मनाया गया स्वामी शुकदेवानन्द जी महाराज का 60वां महानिर्वाण महोत्सव
ऋषिकेश। आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा से श्रावण कृष्ण पंचमी तक आयोजित षड्-दिवसीय संगीतमय श्रीरामचरितमानस अखंड पाठ का समापन मंगलवार को एक भव्य व भावमय संत भंडारे के साथ संपन्न हुआ। यह दिव्य आयोजन परम पूज्य अनन्त श्री विभूषित श्रीमत्परमहंस श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महामण्डलेश्वर श्री स्वामी शुकदेवानन्द सरस्वती जी महाराज के 60वें महानिर्वाण महोत्सव के उपलक्ष्य में संपन्न हुआ।

पूज्य स्वामी शुकदेवानन्द सरस्वती जी महाराज एक महाज्ञानी, सनातन संस्कृति के अद्भुत स्तंभ और वेद-वेदान्त व भक्ति मार्ग के प्रतिबद्ध संत थे। उनका सम्पूर्ण जीवन भारतीय संस्कृति, ज्ञान और भगवद्भक्ति के प्रचार-प्रसार को समर्पित रहा। उन्होंने साधकों को सिखाया –
“जल में नाव रहे तो कोई हानि नहीं, पर नाव में जल नहीं रहना चाहिए। साधक संसार में रहे तो ठीक है, पर साधक के भीतर संसार नहीं रहना चाहिए।”
इस पावन अवसर पर हुए संगीतमय श्रीरामचरितमानस पाठ में सैकड़ों संतों, विद्वानों एवं श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। श्रीरामचरितमानस की दिव्य ध्वनि से संपूर्ण परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो गया। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा –
“श्रीरामचरितमानस, संस्कारों का अमृत है। यह पाठ मर्यादा, सेवा, त्याग और प्रेम जैसे मूल्यों को जीवन में स्थापित करता है। मानस एक दिव्य जीवन-दर्शन है।”
महानिर्वाण महोत्सव के अंतर्गत आयोजित विशाल संत भंडारे में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने संतों की सेवा कर पुण्य लाभ अर्जित किया। यह भंडारा अतिथि देवो भवः की परंपरा का स्मरण और अनुपालन था।

यह आयोजन न केवल पूज्य स्वामी शुकदेवानन्द जी को श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर बना, बल्कि सनातन धर्म के मूल्यों को अपनाने और आत्मचिंतन का अवसर भी प्रदान किया। श्रीरामचरितमानस जैसे ग्रंथ युवा पीढ़ी को जीवन मूल्य और दिशा प्रदान करते हैं, जो आज की बदलती सामाजिक परिस्थितियों में अत्यंत आवश्यक है।
यह आयोजन श्रद्धा, सेवा, भक्ति और आत्मज्ञान की सरिता बनकर समस्त श्रद्धालुओं के हृदय में अमिट स्मृति बन गया।
